सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह : प्रो. आलोक पाण्डेय
गुज़रे दिन याद आते हैं, तो याद आती हैं वो सब कहानियां, जो अतीत का हिस्सा हैं। जो गुज़र कर भी नहीं गुज़र पायीं। साथ चलती रहीं रगों में दौड़ते लहू की तरह, जो आखरी सांस तक साथ रहता है। अंधेरे में भी जब साया साथ नहीं होता, वही लम्हे आस-पास सरगोशी करते रहते हैं। चाहे आँखें खुली हो या बंद, फिल्म की रील तरह तस्वीरें एक-एक करके बदलती रहती हैं। ऐसी ही एक तस्वीर मेरी दूसरी किताब ‘सुर्ख़ियों में लोग’ का लोकार्पण समारोह भी है, जो गुज़रे हुए लम्हों की यादों का हिस्सा है। उस हिस्से की एक कहानी प्रो. आलोक पाण्डेय भी हैं, जिन्होंने अपने स्नेह से मेरा हौसला बढ़ाया था। अब उस घटना को लगभग 18 साल हो रहे हैं, लेकिन लोकार्पण समारोह में आलोक जी की प्रस्तुति आज भी ऐसा लगता है कि कल ही की बात है। उस समारोह का वह सबसे चर्चित समीक्षात्मक लेख रहा था। प्रस्तुत है, ‘सुर्खियों में लोग’ किताब पर प्रो. आलोक पाण्डेय का वही समीक्षात्मक लेख: एफ एम सलीम
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| प्रो. आलोक पाण्डेय |
सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह
एफ एम सलीम की इस संस्मरणात्मक किताब के ही सिलसिले में
मैंने यह शीर्षक दिया है। काफ्का कहते थे कि मुझे साहित्य से ज्यादा दिलचस्पी
जिंदा लोगों में है। बहुत मुनासिब कहते थे वे। और शायद वही कह सकते थे, क्योंकि उन्होंने ही
सबसे ज्यादा महसूस किया था हमारे ज़माने के आदमी के अकेले और आत्मकेंद्रित होते
जान को। यह किताब भी जिंदा लोगों के बारे में है। कुछ ऐसे लोग भी हैं इसमें,
जो यूं तो नहीं रहे पर हमारी यादों में अपने पीछे छोड़ गए कामों में
जिंदा हैं। यह दरअसल एक प्रकार की चहलक़दमी भी होती है, उस
शख्स के साथ, जिसे आप याद कर रहे होते हैं और यह चहल आदमी
सलीम ने बारहा की है और बख़ूबी की है। ऐसा इसलिए कि यह किताब मिलाप अखबार में ‘न्योछावर’ स्तंभ के लिए लिखी गई सामग्री से रची गई
है। इसमें साक्षात्कार हैं,
परिचय हैं और मूल्यांकन भी हैं। हैदराबाद या आंध्र-प्रदेश से संबद्ध जीवन के अनेक
क्षेत्रों से जुड़े लोगों के बारे में यह किताब काफी कुछ कहती है, कई बार उनकी अपनी जुबानी भी।
भूमिका श्री रामजी सिंह उदयन जी ने लिखी है, जो महत्वपूर्ण है। वह गालिब को याद करते
हैं, “बाज़ार से लाएंगे दिलो जाँ और...” ठीक याद करते हैं। क्योंकि एक ऐसे समय में जब सुर्खियां सुर्ख़ हैं और लोग
ग़ायब। ‘सुर्खियों में लोग’ रचनाकार की मूल चिंता मनुष्यता की चिंता को रेखांकित करती है। जब हम पड़ोसी
का नाम नहीं जानते, मन से हाल-चाल पूछे ज़माना हो गया, ऐसे दौर में,
ऐसी किताब का आना जरूरी भी है और महत्वपूर्ण भी। प्रस्तुत पुस्तक सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मकता
तथा कलात्मक संस्कार के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए।
सलीम का रचनाकार हर संस्मरण में मौजूद है। आप उनकी भाषा देखें, राजबहादुर गौड़ के
संदर्भ में वह लिखते हैं, ‘पुराने शहर की सक्रिय गलियों में
कवेली के बिल्ले फेंकती उंगलियां अपनी और उठती सैकड़ों उंगलियों से बेपरवाह किसी
एक दिन सशस्त्र मुद्दा बन जाएंगे, किसने सोचा था।‘.. और बात भाषिक कुशलता पर ख़त्म नहीं होती है, बल्कि
वहां से शुरू होती है। अगर आप इसे नहीं पढ़ेंगे तो कैसे जानेंगे कमल प्रसाद कमल की
नज़्म, ‘जिसे तुम याद में अपनी तड़पता छोड़ आए हो, तुम्हारी नज्र उस बूढ़े
वतन का पैगाम लाया हूं।...’ सुनकर रोता पाकिस्तान कैसा लगता
है।...या फिर आपकी आंखों में गदर का यह सपना कैसा लगता है कि ‘सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा वातावरण निर्मित किया जाए, जहां पर कोई हथियार ना
उठाए, हमारे नागरिक होने के अधिकार सुरक्षित हो।’
मुझे गदर की इन पंक्तियों ने हिंदी के प्रख्यात ग़ज़लकार माधव मधुकर की
पंक्तियां याद दिला दी कि- खानाबदोश किसी ध्रुव प्रदेश से नहीं आते, बल्कि जिसे भी उसके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए, वह खानाबदोश हो जाता है। उदयन जी ने बिल्कुल ठीक कहा है कि सलीम ने
सकारात्मक को सरोकार ही नहीं दिया है, उसे सुर्ख़ियों पर ले
जाने की जिम्मेदारी भी निभाई है और हैदराबाद के इतिहास का एक हिस्सा इस विशिष्ट
लोगों के साथ सलीम की किताब में हमेशा जिंदा रहेगा।
इस बात की ताकीद मैं यूं करता हूं कि मैं पूरी किताब एक बार में पढ़ गया और
फिर तो जैसे पन्ने नहीं खुल रहे थे, हैदराबाद का इतिहास खुल रहा था और इतिहास
के उस गलियारे में कमाल के लोग मिल रहे थे। चहलक़दमी करते, बोलते,
बतियाते, मुस्कुराते, हंसते,
ठहाके लगाते, याद करते, सोचते
और उदास होते, मैं यदि इसे नहीं पढ़ता तो सलीम की इस हैरत
में कैसे शामिल होता कि कैसे उनके पिता के एक दोस्त ने होटल चलाना बंद करके शिक्षक
बनना पसंद किया था, जबकि आजकल शिक्षक होटल चलाना ज्यादा पसंद
करते हैं। कैसे जान पता कि महाकवि शेषेन्द्र शर्मा से टैक्सी ड्राइवर ने अपने
दफ्तर का उद्घाटन करवाया था, कैसे एक प्रशंसक पोस्टमैन
जबरदस्ती घर में घुस आया था और किस तरह एक दर्जी उन्हें जिंदगी भर खत लिखता रहा था,
फिर वह शेर जिस पर महाराज सर किशन प्रसाद ने दो बार उंगली उठाई थी।
मुझे कैसे मिलता, ‘कहां तक आग पहुंची मेरे दिल की- धुआं उठता है देखो आसमाँ से.. मैं वेमूरी आंजनेय शर्मा की इस चिंता से
कैसे जुड़ता की हिंदी को लेकर यदि हम गंभीर नहीं हुए तो यह भाषा केवल सिनेमा देखने
के लिए रह जाएगी। मैं कैसे जानता कि डॉक्टर पोली विजय राघव रेड्डी को आज भी यह दुख
सालता रहता है कि उनके साथ हिंदी माध्यम परीक्षा की तैयारी करने वाला एक हरिजन
दोस्त परीक्षा शुल्क 1 रुपया 50
पैसे जुटा नहीं
सका था। कैसे मुझे मिलते पंडित जसराज हैदराबाद की याद में खोए, यह कहते कि ‘हैदराबाद ने मुझे मिटाकर बनाया है। मैं शुक्रगुजार हूँ इस मिट्टी का।‘ मंज़ूर अहमद मंज़ूर की शिकायत कितनी मौजूं है कि ‘रेलवे
कंपार्टमेंट जैसे घरों में रहकर लोगों की सोच भी सीमित हो गई है’ या ‘पहले लोग मिर्ची चटनी में खुश रहते थे अब
बिरयानी मिलती है तो भी उदास हैं’। जीलानी बानो जी का कहना
कि ‘मैंने एयर कंडीशनर कमरों में नर्म सोफों पर बैठकर
कहानियाँ नहीं लिखी हैं, अपनी कहानियों के पात्रों की तलाश
मैंने कई कई महीने गांव में रहकर की है’, उन्हें महाश्वेता
देवी की बगल में बैठा देता है। उर्दू लेखन की दुर्दशा पर नरेंद्र लूथर की चिंता है
तो मनोहर राज सक्सेना का यह फ़ख्र से कहना कि.. ‘आधा क्यों पूरा मुसलमान कहते हैं और मुझे ही क्यों लगभग उन सभी कायस्थ
बुजुर्गों को कहा जाता है, जिन्होंने हैदराबादी तहज़ीब को अपना बना
लिया।’ यहां आप हैदराबादी तहजीब की बुनावट और
बनावट को देख समझ सकते हैं। मुझे यहां राही मासूम रज़ा याद आ रहे हैं। वे कहते थे
कि हर शहर का अपना एक ईगो होता है। यदि आप उसे प्यार नहीं करेंगे तो वह भी आपको
प्यार नहीं करेगा।
(प्रस्तुत समीक्षात्मक लेख ‘सुर्ख़ियों में लोग’ पुस्तक के लोकार्पण समारोह में दिए गए वक्तव्य की संशोधित प्रस्तुति है।)


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