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۔۔۔۔ जिंदगी का साथ निभाता चलाया गया

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  भीड़ में घूमते-फिरते भटकते चेहरों में उस दिन एक ऐसे चेहरे का सामना हुआ , जिसने कभी अपनी ज़िंदगी की कश्ती खुद चलाने की कोशिश नहीं की। अगर कभी की भी होगी तो वह उसके बस की बात नहीं रही। वह देखने में तो एक मामूली सा चेहरा लगता था , बिल्कुल एक आम ग़रीब आदमी की तरह , लेकिन जब कुछ देर के लिए ही सही मैंने उसकी ज़िंदगी में थोड़ा-सा झांकने की कोशिश की तो वह मेरी मंशा समझ गया और उसने अपनी मर्जी से अपनी ज़िंदगी के अंदरूनी हिस्से के कुछ खिड़कियाँ खोल दीं। फिर तो उसके अतीत में थोड़ा और आगे जाने का रास्ता निकल आया। वह मेरे लिए अब मामूली नहीं रहा था , बल्कि कई सारे अजूबों का एक संग्रह-सा लगने लगा। उसकी ज़िंदगी अजीबोगरीब घटनाओं का एक लंबा सिलसिला थी। लगभग सत्तर से पचहत्तर साल का वह बुजुर्ग व्यक्ति शहर की सड़कों , फुटपाथों , चौराहों , बाज़ारों , गलियों में अक्षरमाला के पोस्टर लिए घूमता था। सुबह सुबह ही वह रूखी सूखी खाकर बाज़ार से खरीदे हुए पोस्टर लेकर लिए गली कूचों में निकल पड़ता। पोस्टर बेचने के लिए वह दूसरे हाकरों की तरह आवाज़ें नहीं लगाता और न ही किसी से खरीदने की ज़िद करता , बल्कि इच्छा और...