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स्थानीय मुद्दों की पत्रकारिता के पर्याय - अख्तर काज़मी

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दाएं से.. अख़्तर काज़मी, रफ़ीक़ जाफ़र और एफ एम सलीम समय रुकता नहीं है, किसी के कहने से भी नहीं, हाँ हम ज़रूर कहीं रुक से जाते हैं, किसी लम्हें में, स्मृतियों के किसी हिस्से में। पत्रकार और लेखक अख़्तर काज़मी के साथ भी कुछ ऐसे ही लम्हें यादगार रहे हैं। पुणे में हिदायतुल्ला रोड पर पुणे कॉलेज ऑफ आर्ट्स , साइंस एंड कॉमर्स है, जिसे अंजुमन खैरुल इस्लाम ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जाता है। मुंबई से लौटने के दौरान सोचा कि एक शाम पुणे में गुज़ारी जाए। रफ़ीक़ जाफ़र साहब से मिलकर बहुत दिन हुए थे। कुछ घंटे के लिए ही सही, वे इस उम्र में भी तलेगांव से वहाँ आते हैं। आज़म कैंपस के प्रवेश द्वार के ठीक सामने डेक्कन मुस्लिम इंस्टीट्यूट की ऐतिहासिक और बेहद लोकप्रिय ए.आर.एस. इनामदार पब्लिक है , जो छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए एक प्रमुख अध्ययन केंद्र है। इसी रीडिंग रूम के एक कोने में पुस्तकालय अध्यक्ष का कमरा है,यहीं पर रफ़ीक़ साहब के साथ बस कुछ मिनट के लिए, सब कुछ मिला लें तो एक घंटे से कुछ ज़्यादा का समय हो सकता है, अख़्तर काज़मी से मुलाक़ात होती है, हालाँकि फोन पर उनसे र...

मानू का यादगार कैलेंडर 2026 ‘अठारह चराग़ एक रोशनी’

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रात का सफर तय करके सूरज जब अंधेरी गुफ़ाओं से बाहर निकलता है तो सुबह यह पैग़ाम देती है कि अंधेरा छट गया है और रोशनी सामने खड़ी ज़िंदगी को नई राह दिखा रही है। फिर अंधेरा चाहे ज़िंदगी के हालात का हो या अज्ञानता का, उसे दूर करने का एक ही तरीका है-ज्ञान... और ज्ञान की शुरूआत निश्चित ही क़लम और कागज़ के सदुपयोग अर्थात पढ़ने-लिखने से ही हो सकती है। अज्ञानता के लिए उर्दू में एक शब्द है, जहालत। यह जीवन में सबसे बुरी अवस्थाओं में से एक है। देखा गया है कि हज़ारों, बल्कि लाखों लोग इस अवस्था से गुज़रते हुए महसूस ही नहीं करते कि उन्होंने खुद को और दुनिया में आने के मक़सद को बिना जाने ही सारी उम्र गुज़ार दी। अब जिन्हें अंधेरे में रोशनी मिल गयी, जिन्होंने अपने जीने की राह के पहले सिरे को पकड़ लिया, कुछ आगे बढ़ गये, उनका गुणगान ज़रूरी है। शायद इसी बात को महसूस करते हुए मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी ने अपने विद्यार्थियों को इस साल अपने कैलेंडर का नायक बनाया है, निश्चित रूप से इसमें छात्र-छात्राएँ दोनों शामिल हैं। ‘ अठारह चराग़ एक रोशनी ’ यही शीर्षक है इस कैलेंडर का। दर असल उस दिन मैं रीति काल प...

सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह : प्रो. आलोक पाण्डेय

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गुज़रे दिन याद आते हैं , तो याद आती हैं वो सब कहानियां , जो अतीत का हिस्सा हैं, जो गुज़र कर भी नहीं गुज़र पायीं। साथ चलती रहीं रगों में दौड़ते लहू की तरह , जो आखरी सांस तक साथ रहता है। अंधेरे में भी जब साया साथ नहीं होता , वही लम्हे आस-पास सरगोशी करते रहते हैं। चाहे आँखें खुली हो या बंद , फिल्म की रील तरह तस्वीरें एक-एक करके बदलती रहती हैं। ऐसी ही एक तस्वीर मेरी दूसरी किताब ‘ सुर्ख़ियों में लोग ’ का लोकार्पण समारोह भी है , जो गुज़रे हुए लम्हों की यादों का हिस्सा है। उस हिस्से की एक कहानी प्रो. आलोक पाण्डेय   भी हैं , जिन्होंने अपने स्नेह से मेरा हौसला बढ़ाया था। अब उस घटना को लगभग 18 साल हो रहे हैं , लेकिन लोकार्पण समारोह में आलोक जी की प्रस्तुति आज भी ऐसा लगता है कि कल ही की बात है। उस समारोह का वह सबसे चर्चित समीक्षात्मक लेख रहा था। प्रस्तुत है , ‘ सुर्खियों में लोग ’ किताब पर प्रो. आलोक पाण्डेय   का वही समीक्षात्मक लेख : एफ एम सलीम   प्रो. आलोक पाण्डेय   सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह एफ एम सलीम की इस संस्मरणात्मक किताब के ही सिलसिले में मैंने यह शीर्षक दिया...

۔۔۔۔ जिंदगी का साथ निभाता चलाया गया

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  भीड़ में घूमते-फिरते भटकते चेहरों में उस दिन एक ऐसे चेहरे का सामना हुआ , जिसने कभी अपनी ज़िंदगी की कश्ती खुद चलाने की कोशिश नहीं की। अगर कभी की भी होगी तो वह उसके बस की बात नहीं रही। वह देखने में तो एक मामूली सा चेहरा लगता था , बिल्कुल एक आम ग़रीब आदमी की तरह , लेकिन जब कुछ देर के लिए ही सही मैंने उसकी ज़िंदगी में थोड़ा-सा झांकने की कोशिश की तो वह मेरी मंशा समझ गया और उसने अपनी मर्जी से अपनी ज़िंदगी के अंदरूनी हिस्से की कुछ खिड़कियाँ खोल दीं। फिर तो उसके अतीत में थोड़ा और आगे जाने का रास्ता निकल आया। वह मेरे लिए अब मामूली नहीं रहा था , बल्कि कई सारे अजूबों का एक संग्रह-सा लगने लगा। उसकी ज़िंदगी अजीबोगरीब घटनाओं का एक लंबा सिलसिला थी। लगभग सत्तर से पचहत्तर साल का वह बुजुर्ग व्यक्ति शहर की सड़कों , फुटपाथों , चौराहों , बाज़ारों , गलियों में अक्षरमाला के पोस्टर लिए घूमता था। सुबह सुबह ही वह रूखी-सूखी खाकर बाज़ार से खरीदे हुए पोस्टर लिये गली कूचों में निकल पड़ता। पोस्टर बेचने के लिए वह दूसरे हाकरों की तरह आवाज़ें नहीं लगाता और न ही किसी से खरीदने की ज़िद करता , बल्कि इच्छा और लाल...

मौत के साये में ज़िंदगी का हौसला

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  ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है , अगर यह देखना हो तो इसे मौत के साथ जोड़कर देखिए। यकीनन जिंदगी और मौत के बीच इतना कम फासला है कि इसे नापा भी नहीं जा सकता। हंसती-मुस्कुराती जिंदगी लम्हे भर में कब मौत की वादी में उतर जाए , पता ही नहीं चलता। माना कि मौत का एक दिन तय है और हम यह भी जानते हैं कि वह किसी भी वक़्त आ सकती है , फिर भी ज़िंदगी जिये जाने का हौसला ज़िंदा दिली में छुपा है।  हम मौत को बार-बार याद करके पल-पल इसलिए नहीं मरते, क्योंकि हमें उस दिन के बारे में पता नहीं होता , लेकिन अगर किसी को मालूम हो जाए कि वह पांच दिन , पांच महीने या पांच साल बाद मरने वाला है , तो सोचिए उसकी जिंदगी कैसी होगी ? जिंदगी के प्रति उसका क्या रवैया होगा ? दुनिया की चकाचौंध में व्यस्त हम उन लम्हों का अंदाजा भी नहीं लगा सकते , लेकिन ऐसे नाजुक हालात में अगर कोई हिम्मत नहीं हारता और हौसले के साथ जीता है , तो वह शख्स बेशक न केवल प्रेरक होता है, बल्कि जब भी मौत और ज़िंदगी की बात छिड़ जाती है,  याद आ जाता है। एक पत्रकार और लेखक के रूप में यूं तो जिंदगी में अनगिनत किरदारों का सामना हुआ। कुछ की कहानी कल...