सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह : प्रो. आलोक पाण्डेय
गुज़रे दिन याद आते हैं , तो याद आती हैं वो सब कहानियां , जो अतीत का हिस्सा हैं। जो गुज़र कर भी नहीं गुज़र पायीं। साथ चलती रहीं रगों में दौड़ते लहू की तरह , जो आखरी सांस तक साथ रहता है। अंधेरे में भी जब साया साथ नहीं होता , वही लम्हे आस-पास सरगोशी करते रहते हैं। चाहे आँखें खुली हो या बंद , फिल्म की रील तरह तस्वीरें एक-एक करके बदलती रहती हैं। ऐसी ही एक तस्वीर मेरी दूसरी किताब ‘ सुर्ख़ियों में लोग ’ का लोकार्पण समारोह भी है , जो गुज़रे हुए लम्हों की यादों का हिस्सा है। उस हिस्से की एक कहानी प्रो. आलोक पाण्डेय भी हैं , जिन्होंने अपने स्नेह से मेरा हौसला बढ़ाया था। अब उस घटना को लगभग 18 साल हो रहे हैं , लेकिन लोकार्पण समारोह में आलोक जी की प्रस्तुति आज भी ऐसा लगता है कि कल ही की बात है। उस समारोह का वह सबसे चर्चित समीक्षात्मक लेख रहा था। प्रस्तुत है , ‘ सुर्खियों में लोग ’ किताब पर प्रो. आलोक पाण्डेय का वही समीक्षात्मक लेख : एफ एम सलीम प्रो. आलोक पाण्डेय सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह एफ एम सलीम की इस संस्मरणात्मक किताब के ही सिलसिले में मैंने यह शीर्षक दिया ...