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सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह : प्रो. आलोक पाण्डेय

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गुज़रे दिन याद आते हैं , तो याद आती हैं वो सब कहानियां , जो अतीत का हिस्सा हैं। जो गुज़र कर भी नहीं गुज़र पायीं। साथ चलती रहीं रगों में दौड़ते लहू की तरह , जो आखरी सांस तक साथ रहता है। अंधेरे में भी जब साया साथ नहीं होता , वही लम्हे आस-पास सरगोशी करते रहते हैं। चाहे आँखें खुली हो या बंद , फिल्म की रील तरह तस्वीरें एक-एक करके बदलती रहती हैं। ऐसी ही एक तस्वीर मेरी दूसरी किताब ‘ सुर्ख़ियों में लोग ’ का लोकार्पण समारोह भी है , जो गुज़रे हुए लम्हों की यादों का हिस्सा है। उस हिस्से की एक कहानी प्रो. आलोक पाण्डेय   भी हैं , जिन्होंने अपने स्नेह से मेरा हौसला बढ़ाया था। अब उस घटना को लगभग 18 साल हो रहे हैं , लेकिन लोकार्पण समारोह में आलोक जी की प्रस्तुति आज भी ऐसा लगता है कि कल ही की बात है। उस समारोह का वह सबसे चर्चित समीक्षात्मक लेख रहा था। प्रस्तुत है , ‘ सुर्खियों में लोग ’ किताब पर प्रो. आलोक पाण्डेय   का वही समीक्षात्मक लेख : एफ एम सलीम   प्रो. आलोक पाण्डेय   सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह एफ एम सलीम की इस संस्मरणात्मक किताब के ही सिलसिले में मैंने यह शीर्षक दिया ...

۔۔۔۔ जिंदगी का साथ निभाता चलाया गया

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  भीड़ में घूमते-फिरते भटकते चेहरों में उस दिन एक ऐसे चेहरे का सामना हुआ , जिसने कभी अपनी ज़िंदगी की कश्ती खुद चलाने की कोशिश नहीं की। अगर कभी की भी होगी तो वह उसके बस की बात नहीं रही। वह देखने में तो एक मामूली सा चेहरा लगता था , बिल्कुल एक आम ग़रीब आदमी की तरह , लेकिन जब कुछ देर के लिए ही सही मैंने उसकी ज़िंदगी में थोड़ा-सा झांकने की कोशिश की तो वह मेरी मंशा समझ गया और उसने अपनी मर्जी से अपनी ज़िंदगी के अंदरूनी हिस्से की कुछ खिड़कियाँ खोल दीं। फिर तो उसके अतीत में थोड़ा और आगे जाने का रास्ता निकल आया। वह मेरे लिए अब मामूली नहीं रहा था , बल्कि कई सारे अजूबों का एक संग्रह-सा लगने लगा। उसकी ज़िंदगी अजीबोगरीब घटनाओं का एक लंबा सिलसिला थी। लगभग सत्तर से पचहत्तर साल का वह बुजुर्ग व्यक्ति शहर की सड़कों , फुटपाथों , चौराहों , बाज़ारों , गलियों में अक्षरमाला के पोस्टर लिए घूमता था। सुबह सुबह ही वह रूखी-सूखी खाकर बाज़ार से खरीदे हुए पोस्टर लिये गली कूचों में निकल पड़ता। पोस्टर बेचने के लिए वह दूसरे हाकरों की तरह आवाज़ें नहीं लगाता और न ही किसी से खरीदने की ज़िद करता , बल्कि इच्छा और लाल...

मौत के साये में ज़िंदगी का हौसला

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  ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है , अगर यह देखना हो तो इसे मौत के साथ जोड़कर देखिए। यकीनन जिंदगी और मौत के बीच इतना कम फासला है कि इसे नापा भी नहीं जा सकता। हंसती-मुस्कुराती जिंदगी लम्हे भर में कब मौत की वादी में उतर जाए , पता ही नहीं चलता। माना कि मौत का एक दिन तय है और हम यह भी जानते हैं कि वह किसी भी वक़्त आ सकती है , फिर भी ज़िंदगी जिये जाने का हौसला ज़िंदा दिली में छुपा है।  हम मौत को बार-बार याद करके पल-पल इसलिए नहीं मरते, क्योंकि हमें उस दिन के बारे में पता नहीं होता , लेकिन अगर किसी को मालूम हो जाए कि वह पांच दिन , पांच महीने या पांच साल बाद मरने वाला है , तो सोचिए उसकी जिंदगी कैसी होगी ? जिंदगी के प्रति उसका क्या रवैया होगा ? दुनिया की चकाचौंध में व्यस्त हम उन लम्हों का अंदाजा भी नहीं लगा सकते , लेकिन ऐसे नाजुक हालात में अगर कोई हिम्मत नहीं हारता और हौसले के साथ जीता है , तो वह शख्स बेशक न केवल प्रेरक होता है, बल्कि जब भी मौत और ज़िंदगी की बात छिड़ जाती है,  याद आ जाता है। एक पत्रकार और लेखक के रूप में यूं तो जिंदगी में अनगिनत किरदारों का सामना हुआ। कुछ की कहानी कल...

बर्फ़ वाले डॉक्टर साब

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यह उन दिनों की बात है जब मैं उर्दू दैनिक मुन्सिफ़ के लिए   ' हुजूम में चेहरा '  कॉलम लिख रहा था। इस कॉलम के बहाने हर हफ़्ते किसी न किसी से मिलना और उनसे उनकी कहानियाँ सुनना एक दिलचस्प सिलसिला चल निकला था। इस कॉलम के लिए लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखी।   1999   से   2005   के बीच लिखी गई इन कहानियों के कुछ हिस्से मैं इस डिजिटल दुनिया को सौंप रहा हूँ। पहली कहानी है.. बर्फ़ वाले डॉक्टर साब सफलता और असफलता दो ज़रूरी चीज़ें हैं , जो इंसान की ज़िंदगी में काफ़ी महत्व रखती हैं, क्योंकि ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव इन्हीं पर निर्भर करते हैं। कुछ लोग ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर तराज़ू के एक पलड़े में अपनी और दूसरे में अपने दोस्तों , पड़ोसियों और जान-पहचान वालों की ज़िंदगी को तौलने के आदी हो जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी हैं , जो सफलता और असफलता के इन दो पलड़ों से अलग-थलग , अपने तरीके से अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं , जैसे अपने दिन गिन रहे हों या बस ऐसे ही गुज़ार रहे हों, लेकिन उसमें भी उनका अपना रस है, अनुभव है, आनंद है। सोचता हूँ वो लोग किस हालत में जी रहे होंगे जो न तो निर...

शादी, वलीमा, कला-संस्कृति, साहित्य और जड़ी बूटियाँ

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दकन के छोटे से शहर सेड़म की यादगार यात्रा   घर से निकला तो दो बजने को अभी कुछ वक़्त बाक़ी था। ख़याल यही था कि जो भी उधर की बस मिलेगी सवार हो जाऊंगा। स्टॉप पर पहुँचने के कुछ देर बाद ही एक बस आती दिखाई दी।   ये जानकर भी कि वो बस मंज़िले मक़सूद ( लक्षित गंतव्य स्थल ) तक नहीं पहुंचाती, उसमें सवार हो गया। यही सोचकर कि अगले स्टेशन पर कुछ और बसें रुकती हैं। कुछ दूर पहुंचने पर बस के पिछले शीशे से झांक कर देखा तो पाया की चेवेल्ला की बस पीछे आ रही है। दिल ही दिल में सोचने लगा कि अगले बस स्टॉप पर उतर कर उसमें सवार हुआ जाए, लेकिन इस सोच को एक मिनट भी नहीं पाल सका था कि पिछली बस ओवर टेक करते हुए आगे निकल गयी। खैर काली मंदिर पर उतरने के बाद मैं अगली बस का इंतज़ार करने लगा। इंतज़ार बिल्कुल लंबा नहीं था। कुछ ही मिनट में, मैं विक़ाराबाद जाने वाली बस में सवार एक सीट पर बैठ चुका था। दिमाग़ के किसी कोने में खुशी का एहसास जागने लगा था कि सब कुछ प्लान के मुताबिक़ हो रहा है।   गूगल मैप पर देखा तो बस के विक़ाराबाद पहुँचने और वहां से हुसैन सागर एक्सप्रेस छूटने में सिर्फ अठारह मिनट का अंतर। उधर ...