शादी, वलीमा, कला-संस्कृति, साहित्य और जड़ी बूटियाँ

दकन के छोटे से शहर सेड़म की यादगार यात्रा

 घर से निकला तो दो बजने को अभी कुछ वक़्त बाक़ी था। ख़याल यही था कि जो भी उधर की बस मिलेगी सवार हो जाऊंगा। स्टॉप पर पहुँचने के कुछ देर बाद ही एक बस आती दिखाई दी।  ये जानकर भी कि वो बस मंज़िले मक़सूद (लक्षित गंतव्य स्थल) तक नहीं पहुंचाती, उसमें सवार हो गया। यही सोचकर कि अगले स्टेशन पर कुछ और बसें रुकती हैं। कुछ दूर पहुंचने पर बस के पिछले शीशे से झांक कर देखा तो पाया की चेवेल्ला की बस पीछे आ रही है। दिल ही दिल में सोचने लगा कि अगले बस स्टॉप पर उतर कर उसमें सवार हुआ जाए, लेकिन इस सोच को एक मिनट भी नहीं पाल सका था कि पिछली बस ओवर टेक करते हुए आगे निकल गयी। खैर काली मंदिर पर उतरने के बाद मैं अगली बस का इंतज़ार करने लगा। इंतज़ार बिल्कुल लंबा नहीं था। कुछ ही मिनट में, मैं विक़ाराबाद जाने वाली बस में सवार एक सीट पर बैठ चुका था। दिमाग़ के किसी कोने में खुशी का एहसास जागने लगा था कि सब कुछ प्लान के मुताबिक़ हो रहा है।  


गूगल मैप पर देखा तो बस के विक़ाराबाद पहुँचने और वहां से हुसैन सागर एक्सप्रेस छूटने में सिर्फ अठारह मिनट का अंतर। उधर दूसरी तरफ़ ट्रेन को ट्रैक किया तो वह अभी नामपल्ली से छूटी नहीं थी। थोड़ा सा इतमिनान के ट्रेन के पहुँचने से पहले पहुँच जाऊँगा, लेकिन कहते हैं कि न ख़ुशी हमेशा रहती है और न ग़म, इस सफर में भी कुछ ऐसा ही हुआ, इसके इसके बावजूद वक़्त से पहले पहुँचने की उम्मीद थी, लेकिन यह सच ही वक़्त अपने हाथ में नहीं रहता, वह रेत की तरह फिसलता रहा है। रास्ते में बस रुकती रही और बस के पहुंचने और ट्रेन के छूटने के बीच लगातार अंतर कम होता रहा और दिल की धड़कनें तेज़ होती रही। बार-बार सेलफोन में ट्रेन और बस के पहुँचने की मैपिंग पर नज़र जाती रही। रास्ते में कभी ट्रैफिक को बुरा भला तो कभी सड़क की ख़स्ताहालत पर सड़क बनाने और उसकी मरम्मत करने वालों की शान में गुस्ताक़ी। ...किस्मत अच्छी थी कि ट्रेन पाँच मिनट लेट थी और बस अड्डा स्टेशन के बिल्कुल पास। किसी तरह हाँफते हुए विक़ाराबाद के प्लेट फार्म नंबर दो पर पहुँचा और ऐसा लगा जैसे हुसैन सागर एक्सप्रेस मेरे साथ ही स्टेशन पहुँची है।

विक़ाराबाद नीलगिरी के घने जंगलों और अनंतगिरी की पहाड़ी चोटियों के पास बसा एक छोटा सा शहर, जिससे अनगिनत यादें जुड़ी हुई हैं। आज कल मुंबई या बैंगलोर के लिए मैं यहीं से ट्रेन में सवार होता हूँ। लोगों को हैरत ज़रूर होती है कि हैदराबाद में रहता हूँ और विक़ाराबाद से रिज़र्वेशन, बिल्कुल घर से सिकंदराबाद, हैदराबाद या लिंगमपल्ली पहुंचने तक मैं विकाराबाद पहुंच जाता हूँ। ई-भाषा के निदेशक डॉ. राशिद अहमद, उनके सहयोगी बिलाल अली और दूसरे मित्र पहले से ट्रेन में मौजूद थे। वो नामपल्ली, बेगमपेट और लिंगमपल्ली से ट्रेन में सवार हुए थे। ट्रेन में ही पता चला कि बिलाल अली ने भी मेरी तरह सिर्फ दो मिनट पहले पहुंचकर ट्रेन में सवार होने की सिंगल दौड़ (अकेले दौड़कर) का मुक़ाबला जीता था।


मैंने सोचा नहीं था कि एक छोटा सा ऑडियो संदेश, इतनी यादगार यात्रा की भूमिका तैयार करेगा। यादगार इसलिए भी कि यह सिर्फ शादी या वलीमे की दावत नहीं थी, ज्ञानवर्धक जानकारियों से भरपूर अपनी तरह की पहली दावत देखी और मान गये कि डॉ. मज़हर सिद्दीक़ी (अबू मज़हर ख़ालिद) बहूभाषाविद् होने के साथ साथ कई सारी गतिविधियों में न केवल रुची रखते हैं, बल्कि देश भर में अपने चाहने वालों की ऐसी टीम रखते हैं कि उनकी एक आवाज़ पर बोरिया बिस्तर बांध कर चल पड़ते हैं और जी जान लगाकर उन गतिविधियों में सक्रिय हो जाते हैं। कई अरब देशों के दस्तवेज़ों के अनुवाद का काम हैदराबाद में कर रहे हैं। छोटी सी उम्र में उन्होंने कई बड़ी संस्थाओं के साथ ज्ञान के आदान प्रदान के लिए एमओयू किये हैं। उनकी तरफ़ से ये मेरे लिए पहली पारिवारिक दावत थी।

हैदराबाद से बिल्कुल नज़दीक केवल एक सौ साठ-सत्तर किलोमीटर पर एक छोटा सा शहरी इलाका है, सेडम। तेलंगाना और कर्नाटक की सीमा पर गुलबर्गा ( जो इन दिनों कलबुर्सेगी हो गया है) कुछ किलोमीटर पहले यह शहर यहाँ की सीमेंट फैक्टरियों के लिए प्रसिद्ध है। मुंबई और गुलबर्गा जाने के दौरान कई बार रेलगाडी की खिड़कियों से इस शहर में झांका है, लेकिन ट्रेन के भीतर से स्टेशन का भीतरी हिस्सा, कुछ इमारतों और दूर फैक्टरियों की चिमनियों के अलावा ज्यादा कुछ नज़र नहीं आता। इस बार तो तय था कि यहां कम से कम दो दिन गुज़ारने हैं। 

सेडम जाना उसी दिन तय हो गया था, जिस दिन डॉ. मज़हर सिद्दीकी ने वाट्सएप पर एक दावतनामे (निमंत्रण पत्र) के साथ ऑडियो संदेश भी भेजा था। उन्होंने कहा था कि उनके भाई का वलीमा है और साथ ही कुछ ऐसा प्रोग्राम जो बिल्कुल अनोखा है। यूँ ये उनकी तरफ़ से पहली दावत थी और मैसेज में कुछ ऐसा असर था कि मैंने जाने का इरादा कर लिया। मैंने जवाबन मैसेज कर दिया कि इंशाअल्लाह मैं आ रहा हूं। दावत से तीन चार दिन पहले जब मैंने उनको फोन किया तो उन्होंने कहा वो स्वागत के लिए तैयार हैं और उनकी टीम में से कोई फोन करके पूरी जानकारी देगा। उस दिन पलट कर फोन नहीं आया तो मेरा इरादा कुछ डगमगा सा गया, हालाँकि दोपहर के बार डॉ. राशिद ने बताया कि वो सफर की तैयारी कर चुके हैं, इस बारे में कुछ देर बाद बताएँगे। उनकी कुछ देर दूसरे दिन तक भी नहीं हुई, लेकिन दूसरे दिन जेईएलटी के मुबश्शिर साहब का फोन आया कि वो रिजर्वेशन कर रहे हैं, मैंने कहा कि कल बताऊँगा। दूसरे दिन बिल्कुल मेरी सुबह मुबश्शिर का फोन रिसीव करने से ही हुई। नींद में मैंने कह दिया कि अभी मेरा आना तय नहीं है। फोन रखने के अगले ही पल मुझे वह ऑडियो मैसेज और अपने रिप्लाई की याद आयी तो मैंने बिना एक मिनट गंवाएँ मुबश्शिर साहब को विकाराबाद से रिजर्वेशन करने के लिए कह दिया। उनके लिए भी ये पहेली ही थी कि मैं हैदराबाद में रहकर विक़ाराबाद से क्यों सवार हो रहा हूँ। डॉ. राशिद न तो यह भी समझ लिया था कि यहाँ मेरा पहले से कोई काम होगा। खैर ट्रेन हम टाइम टेबल गड़बड़ाने के बावजूद ट्रेन में सवार हो पाने का जश्न मना रहे थे।  


विक़ाराबाद से ट्रेन छूटी तो बस एक घंटे में सेडम पहुँच चुके थे। होटल पहुँचे, कुछ देर आराम करने के बाद खाने पर बुलाया गया। शाम हो चुकी थी, कुछ ही देर में फंक्शन हाल पहुंचना था, तो फिर होटल में खाना किस बात का! फिर भी स्टार्टर पर लंबा दौर चला, लेकिन शुद्ध वेजेटेरियन रेस्तराँ में चाय का प्रबंध नहीं था, खैर कुछ देर कमरे में रुकने के बाद डॉ. राशिद के साथ चाय के लिए बाहर निकले और लगभग एक किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद चाय का कप हाथ में था। फंक्शन हाल वहाँ से कुछ दूरी पर था, लेकिन दावत की तैयारी के लिए फिर से होटल लौटना ज़रूरी था। इस तरह अबू बकर सिद्दीकी साहब के फरज़ंद की शादी के बहाने ही सही शाम के वक्त दो से तीन किलोमीटर की पैदल यात्रा का मौक़ा मिला, बहुत लंबे अरसे बाद। आज कल हम पैदल चलते ही कहाँ हैं, घर के पास वाली दुकान से भी कुछ लाना होस तो दुपहिया निकलती है। ऐसा लगता है कि अब पैदल चलने के लिए ही सही, आस पास के छोटे शहरों की दावत क़बूल कर लेनी चाहिए।

डॉ. राशिद अहमद और बिलाल अली


सीमेंट फैक्टरियों को जाने वाली रेलवे लाइन के पास ही जी.के. रोड पर केएनजेड फंक्शन हाल जनवरी (2026) के चौथे सप्ताह में सेड़म निवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि चितापुर
, दंडोती और आसपास के गाँवों के रिश्तेदारों के लिए खास डेस्टिनेशन बन गया था, इसलिए भी कि यहाँ सिद्दीक़ी परिवार के शादी और वलीमे के साथ-साथ कुछ खास होने वाला था। फंक्शन हाल के बाहर खुले इलाके में दूर तक शामियाने लगे थे और फंक्शन हाल में एक विशेष कला, संस्कृति, साहित्य और स्वास्थ्य से जुड़ी यादगार प्रदर्शनी विज़डम हाउस गैलरी की तैयारियाँ चल रही थीं। मैं भी डॉ. राशिद और बिलाल अली के साथ देसी जड़ी बूटियों के छोटे छोटे पैकेट खोलकर कटोरियाँ भरने में लग गया। कभी-कभी किसी घांस-फूंस सी लगने वाली चीज़ों को छू भी लेता। आंवला, बबूल की फल्ली, दालचीनी, राई, मेहंदी, हिंग, कुलथी, मेथी, हल्दी, चिरायता, धतूरा, जावित्री, जामुन, इमली, शहतूत, मूली, फिटकरी, पुदीना, अज्वाइन, ये.. वो.. पूरे सौ कटोरे भर दिये और उन पर उनके नाम भी चिपकाने का काम बिलाल कर रहे थे। कुछ देर में डॉ. मज़हर उन सब जड़ी बूटियों के फायदे समझाने वाले चार्ट लेकर हाजिर थे, जिसपर हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में उनके नाम के साथ-साथ एक क्यूआर कोड भी था, जिसके स्कैन करने से सेलफोन उसकी जानकारी से भरे वीडियो पर ले जाता है।  

पता नहीं इतनी सारी जड़ी बूटियाँ उन्होंने कब जमा कर ली थी और उनके प्रदर्शन की योजना बनाने में उनको कितने दिन लग गये थे।
 बताया गया कि इसकी योजना में मौलाना अब्दुल रहीम खुर्रम और अबू अल-खैर सिद्दीकी की भूमिका भी रही है। प्रदर्शनी जब शुरू हुई तो लोगों के उत्साह से उसे देखे जा रहे थे। वाह.. ये तो हमारे घर के पास ही उगता है.. हमारे खेत के पास ऐसे कई पेड़ पौधे हैं.. ये तो पास वाली दुकान में भी मिलता है.. इस जैसे कई संवाद प्रदर्शनी देखने वालों की ज़ुबान से सुनना बड़ा अच्छा लगा। कुछ तो डॉक्टर और हकीम भी उस दावत में थे, जिन्होंने आम लोगों तक इस तरह से महत्वपूर्ण जानकारी पहुँचाने के उद्देश्य को सराहे बिना नहीं रह सके। इस प्रदर्शनी का दूसरा भाग था अरबी कैलीग्रैफी और साहित्य, इतिहास, दर्शन, अध्यात्म सहित विभिन्न विषयों पर पुस्तकें तथा कैलीग्राफी के उत्तम नमूने।

प्रदर्शनी में हैदराबाद से चित्रकार और कैलिग्राफी कलाकार एम ए लतीफ फारूक़ी की उपस्थिति भी आकर्षण का केंद्र रही, कुछ ही देर में प्रदर्शनी गैलरी में उनकी उपस्थिति का यह लाभ हुआ कि कई चेहरे अपना पोर्टेट उतरते देख खिल उठे। उनमें से शायद कुछ ने तो यह सोचा भी नहीं होगा कि चित्रकार लतीफ़ साहब किसी दिन सामने बैठे उनका पोर्ट्रेट उतारेंगे। उनके साथ हैदराबाद के दो और चित्रकार ग़ौसुद्दीन अजीम और अख़्तर हुसैन भी मौजूद थे। कुरान और हदीस की रोशनी में जिंदगी को बेहतर बनाने वाले पैग़ाम के लगभग सौ पोस्टर उर्दू, कन्नड और रोमन में गैलरी का हिस्सा थे।

डॉ. मजहर सिद्दीकी का यह प्रयास निश्चित रूप से सरहानीय कहा जा सकता है कि उन्होंने कुछ ही दिन में अपनी संस्था जेआईएलटी,  जोधा इन्फोलिंगोटेक प्राइवेट लिमिटेड, इदारा ए अदबियात उर्दू, दारुल हुदा उडपी, मिल्ली एग्रिकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट के सहयोग से इस प्रदर्शनी को आकार दिया था, जिसने अब्दुर्रहीम और अब्दुररहमान दोनों भाइयों की शादी और वलीमे को यादगार बना दिया।

सेडम की यात्रा के दौरान जेब में रखे सेलफोन के लिए भी कुछ यादें चाहिए थीं, उसका ख़याल करते हुए जब मैं पुराने पत्रकार मित्र रक़ीब मुजाहिद साहब के साथ सुबह की चाय की तलाश में होटल के कमरे से बाहर निकला तो पाया कि गुलबर्गा-हैदराबाद मार्ग पर कई सारी बैल बंडियाँ गुज़र रही हैं। किसी में एक बैल, तो किसी में दो बैल जुते हैं। खास बात यह है कि यह बंडियाँ सामान्य बैल बंडियों जैसी नहीं हैं, बल्कि पहियों के ऊपर एक लकड़ी का बना हुआ प्लेटफार्म है और रस्सियाँ लगी हैं। कुछ दूर चाय की छोटी सी टपरी पर रुकने पर वहाँ संदीप, काशीनाथ और दूसरे गाड़ीवानों से मुलाक़ात हुई। उन्होंने बताया कि वे हर दिन नदी से रेत लाने का काम करते हैं। पहले यह काम ट्रैक्टर किया करते थे, लेकिन अब ट्रैक्टर बंद कर दिये गये हैं। कुछ युवा तो ऐसे हैं, जिन्होंने इस काम को विरासत के तौर पर संभाल रखा है, उन्होंने अपने पिता की गाड़ी अपने हाथ लेली है। इस मार्ग पर लगभग 100 गाड़ीवान काम करते हैं, जो हर दिन लगभग दो ट्रिप रेति नदी से निर्माणस्थों तक ले जाते हैं। रोज़गार बन जाता है और छोटे से शहर में ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं। अच्छी बात यह है कि अभी उनका जीवन यांत्रिक नहीं हुआ है। काम से पहले, बीच में, काम के बाद देर तक दोस्तों के साथ बतियाने और अपने बैलों का ख़याल रखने का समय उनके पास बचा रहता है।

अब्दुर्रक़ीब मुजाहिद साहब के साथ

खैर.. इस छोटे से शहर सेड़म में दो दिन में घूमने फिरने के लिए कुछ था नहीं, लेकिन एक जूतों की दुकान पर इस्माईल और नवाज़ साहब से मुलाक़ात हुई और उन्हीं के मश्वरे पर सवेरा होटल में चाय भी पी ली। डॉ. राशिद के साथ बस स्टेशन पर पहुँचकर कुछ देर टहते हुए पाया कि यहाँ से कर्नाटक, तेलंगाना के दूर दराज़ के इलाकों तक बसें चलती हैं।

दो दिन की मियाँ की दौड़ मस्जिद तक पहुंचनी थी, सो हमें घर भी लौटना था। हालाँकि दूसरे दिन का दंडौती के फार्म हाउस का प्लान था, लेकिन कभी कभी ज़िंदगी की मसरूफियतें बता देती हैं कि प्लान चाहे जितना पुख़्ता बना लो, उसे बीचमें छोड़ना भी पड़ सकता है। सुबह सात बजे से पहले ही आर्टिस्ट हुसैन अख़तर साहब के साथ मैं सेडम के बस स्टेशन पर मौजूद था, लेकिन याद आया कि रास्ते में पर्गी कुछ देर रुकना है, लेकिन दो ढाई घंटे के सफर में अखतर हुसैन की रंगों से भीर ज़िंदगी के कई पहलुओं को पढ़ने का मौक़ा मिला।


उधर डॉ. राशिद और उनकी टीम फार्म हाउस पहुँच चुकी थी, वहाँ जो कुछ उन्होंने जिंदगी के पुरलुत्फ लम्हे गुज़ारे, उन तस्वीरों में मेरी ग़ैर हाज़री की शिकायत होती रही, लेकिन ये भी क्या कम है कि उन शिकायतों में अगली बार फार्म हाउस ज़रूर जाना है, की ख़्वाहिश ने जगह पालिया है। इंशाअल्लाह..। 

Comments

  1. सलीम साहब बहुत अच्छा लिखा है।

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