बर्फ़ वाले डॉक्टर साब



यह उन दिनों की बात है जब मैं उर्दू दैनिक मुन्सिफ़ के लिए 'हुजूम में चेहरा' कॉलम लिख रहा था। इस कॉलम के बहाने हर हफ़्ते किसी न किसी से मिलना और उनसे उनकी कहानियाँ सुनना एक दिलचस्प सिलसिला चल निकला था। इस कॉलम के लिए लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखी। 1999 से 2005 के बीच लिखी गई इन कहानियों के कुछ हिस्से मैं इस डिजिटल दुनिया को सौंप रहा हूँ।

पहली कहानी है.. बर्फ़ वाले डॉक्टर साब

सफलता और असफलता दो ज़रूरी चीज़ें हैं, जो इंसान की ज़िंदगी में काफ़ी महत्व रखती हैं, क्योंकि ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव इन्हीं पर निर्भर करते हैं। कुछ लोग ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर तराज़ू के एक पलड़े में अपनी और दूसरे में अपने दोस्तों, पड़ोसियों और जान-पहचान वालों की ज़िंदगी को तौलने के आदी हो जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी हैं, जो सफलता और असफलता के इन दो पलड़ों से अलग-थलग, अपने तरीके से अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं, जैसे अपने दिन गिन रहे हों या बस ऐसे ही गुज़ार रहे हों, लेकिन उसमें भी उनका अपना रस है, अनुभव है, आनंद है।

सोचता हूँ वो लोग किस हालत में जी रहे होंगे जो न तो निराश हैं और न ही आशावान! लेकिन उनकी ज़िंदगी निरंतर संघर्ष की मिसाल बन गई है। ऐसे ही चेहरों में से एक थे डॉक्टर साब। साहब का ठाट बाट उन्हें छूकर नहीं गुज़रा था, इसलिए वो साब ही बने रहे। असल में, ये साब कोई डिग्री होल्डर या प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर नहीं थे, बल्कि डॉक्टर उनकी उर्फियत अर्थात निकनेम था। वो हैदराबाद के ऐतिहासिक गोलकोंडा किले के बड़े बाज़ार में रहते थे। उन दिनों इस इलाके में बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई डॉक्टर साब को अच्छी तरह जानता था। डॉक्टर साब करीब पाँच-छह दशकों से बर्फ और पान बेचकर गुज़ारा कर रहे थे, और जब बीसवीं सदी अपनी आखिरी साँसें गिन रही थी, तब वो अपनी ज़िंदगी के आठवें दशक में जी रहे थे। इस कमज़ोर उम्र में भी वो अपने बेटे, बहू और नाती-पोतों का सहारा थे। अगर आप किले के बड़े बाज़ार में, या उनके घर के आस-पास भी उनके असली नाम इमामुद्दीन से उनके बारे में पूछताछ करें, तो शायद ही कोई उन्हें जानने वाला मिलता। दरअसल इमामुद्दीन खुद डॉक्टर साब कहलाने के इतने आदी हो गए थे कि अगर आप उन्हें उनके असली नाम से आवाज़ देते, तो शायद वो भी पलटकर न देखें। वहीं अगर आप किले में कहीं भी किसी से बर्फ वाले डॉक्टर साब के बारे में पूछते, तो कोई भी आपको उनका पता बता देता।

जब मैंने उन्हें पहली बार देखा, तो वे काली शर्ट और रंगीन लुंगी पहने हुए थे, हाथ में स्टील का गिलास पकड़े हुए, बर्फ की ठेलागाड़ी से चाय लेने के लिए काफी दूर होटल बिस्मिल्लाह की ओर तेज़ी से क़दम आगे बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर मुझे यकीन नहीं हुआ कि ये डॉक्टर साब थे या उन्हें डॉक्टर साब कहा जाता था। आखिर डॉक्टर साब कहलाने की कोई तो वजह होगी! लगभग अस्सी साल के बुज़ुर्ग गिलास के ऊपर काग़ज़ ढककर अपनी रुमाल से नीचे ऊपर दोनों हाथों से पकड़े आहिस्ता-आहिस्ता ठेलाबंडी के पास पहुँचे। स्टील के गिलास से एक प्याली में कुछ चाय उंडेली और अपने लिए गिलास को ही प्याली बना दी। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मेरा उनसे पहला सवाल था कि आपका नाम डॉक्टर साब कैसे पड़ा? इस बारे में डॉ. साब ने अपने दिमाग की बंद खिड़कियाँ खोलते हुए कहा,

“बहुत ज़माने पहले की बात है, जब मैं साइकिल पे बर्फ बेचता था। बर्फ के साथ शरबत भी। जैसे आज मेडिकल स्टोर पर दवा की गोलियाँ मिल जाती हैं, उस वक़्त दवाखाने में अर्क़ (रस) मिलता था और मेरा शरबत भी दवाख़ाने में मिलने वाले अर्क़ जैसा ही होता था और मैं भी डॉक्टर की तरह अच्छा खासा मोटा ताज़ा हुआ करता था। लोग मज़ाक में मुझे डॉक्टर साब कहते थे, फिर मेरा नाम डॉक्टर साब हो गया। अब कोई मुझे मेरे असली नाम से नइं जानता।”

डॉक्टर साब से बातचीत के दौरान मुझे महसूस हुआ कि यह इनसान किसी ज़माने में बड़ा दिलचस्प रहा होगा। पान और बर्फ से अपने रिश्ते की कहानी सुनाते हुए डॉक्टर ने बताना शुरू किया,

"गिनती कैसे करूँ? हो गए होंगे पैंसठ साल, यां, इसी जगे पे बर्फ बेचरौं। एक्शन (पुलिस एक्शन 1948) से पहले से... उस वक्त मैं 12 साल का था। साइकिल पो फिरता था। अब मैं 77 साल का हूँ। जब ये ठेला बंडियाँ नइं थे, तांगे, दुल्हन के मियाने और हाथ के रिक्शा थे। दूला (दूल्हा) घोड़े पर निकलता था। ये पूरा इलाक़ा सराय था। (सामने सड़क की ओर इशारा करते हुए) बहुत कम लोग थे। वह रंगैया कोमटी और लंगर हौज़ में पेंटैया नाम का एक डॉक्टर था, ये सब लोगां मेरेकु अच्छा पहचानते थे।"

फिर डॉक्टर के दिमाग में कई यादें ताज़ा हो गईं। बचपन, जवानी, दोस्त, पुलिस एक्शन, बदलते हालात और फिर अपने और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतज़ाम करने का बिना विराम का संघर्ष। यादों की एक और खिड़की खोलते हुए डॉक्टर साब ने बताया कि बर्फ़ बेचने के साथ-साथ उन्होंने कुछ दिन साइकिल रिक्शा भी चलाया और फिर बाद में साइकिल रिक्शा बेचकर यह ठेलाबंडी खरीदी। बताने लगे,

"बाईस पोते-पोतियां, नवासे-नवासियाँ हैं मेरे। एक नवासे की शादी भी हो चुकी है। पोते की शादी जल्दी होने वाली है। मैं चौथी जमात (कक्षा) तक पढ़ा। उस वक़्त  मेरे वालिद (पिता) की तन्ख़ा 13 रुपये थी। वो निज़ाम की गोलकोंडा फ़ोर्स में दो पट्टी वाले मुलाज़ि थे। मैं भी प्रेम में काम करा और एक्शन(1948) से पहले, रहबरे दकन में। 5 साल तक 2 रुपये महाना से 150 रुपये माहाना तक की तन्ख़ा मिली, फिर छोड़ दिया।"

इमामुद्दीन उर्फ़ डॉक्टर साब ने अपने तीन बेटों की शादी तो जैसे तैसे कर दी, लेकिन दो बेटियों की शादी के लिए उन्हें अपना घर बेचकर किराए के घरों में आसरा लेना पड़ा। वैसे तो ये एक आम बात है, लेकिन ऐसी बातें हमारे समाज का एक भयानक चेहरा सामने लाती हैं। न जाने कितने बाप अपनी बेटियों की शादी के लिए अपने पूर्वजों की बेच कर बेघर हो गए होंगे।

इमामुद्दीन जैसे सैकड़ों,  बल्कि हज़ारों माता-पिता अपनी बेटियों की शादी के लिए कभी अपना घर तो कभी अपनी पेंशन बेच देते हैं, लेकिन क्या समाज ने कभी इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचा है? रोज़ दहेज के खिलाफ नारे लगते हैं, बड़े-बड़े भाषण होते हैं, कभी-कभी रैलियां भी निकलती हैं, अखबारों में लंबे-लंबे पत्र और लेख छपते हैं, लेकिन क्या समाज ने कभी उस बूढ़े और बेघर पिता के मुरझाए चेहरे और उसके दिल में छिपे दर्द को महसूस किया है?

डॉक्टर साब के सिर के लगभग सारे बाल सफेद हो गए थे। अब उन्हें भी अक्सर एक असली डॉक्टर साब की ज़रूरत पड़ने लगी थी। लेकिन उन्होंने अपनी ठेलागाड़ी पर बर्फ और पान बेचना नहीं छोड़ा, बल्कि अब बर्फ और पान के साथ-साथ उन्होंने जाम (अमरूद) भी रख लिया था ताकि आय थोड़ी बढ़ जाए। क्योंकि उनका एक बेटा, बहू और उनके पांच बच्चे उनके साथ ही रहते हैं। परिवार की कहानी बताने लगे, "दो बेटे अलग (रहते) हैं और एक को मैं पकड़ के हूँ।"

पकड़ के हूँ.. पर मेरा चौंकना लाज़मी था। डॉक्टर साब ने भी महसूस किया, फिर बताने लगे, "मेरा ये लड़का पास के यूनानी दवाख़ाने में काम करता है। चौदह साल हो गए, अभी तक परमिट (परमानेंट) नइं करे! पहले 75 रुपये माहाना देते थे, अब अब 600 रुपये देते हैं।(वर्ष 2003 में), मगर 600 रुपये से क्या होता। इतने में अपने बच्चों पालनाइच भौत मुश्किल है, इसलिए, मेरेसी जब तक हुंगा, मैं उसकी मदद करूँगा।"

डॉक्टर साब मानते थे कि इस लंबी ज़िंदगी में उन्होंने कुछ हासिल नहीं किया। इसीलिए कई लोग उनसे पूछते हैं। डॉक्टर! दुनिया किधर की किधर चली गइ, तुम अपनी पुरानी चाल नइं बदले।... उन्हें इन बातों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मेहतन से कमाई होई रोटी के कुछ निवालों पर उन्हें गर्व है। इसलिए, अपनी कमाई पर इतराते हुए वे कहते हैं,

"किस्मत वाला हूँ, जो याँ खड़ा हूँ। किसी के सामने हाथ नइं फैलाया। अब तो आँखों को भी कम दिखने लगा है। एक आँख का ऑपरेशन फेल हो गया! ज़ईफ़ (वृद्ध) लोगों के वजीफे(पेंशन) के लिए फ़ॉर्म भरे हुए चार महीने हो गए हैं, पर अभी तक कोई जवाब नहीं आया। अब अल्लाह, अल्लाह, बोलको दिन में तीन बार हाथ उठारौं (नमाज पढ़के दुआ करता हूँ) जल्दी उठालेना बोलको...!"

उस मुलाक़ात को लगभग 26 साल हो गए हैं, पर मुझे आज भी उनकी बातें, वो चेहरा याद है। निराशा से भरे जीवन के बावजूद, हर दिन एक नए इरादे के साथ ज़िंदगी शुरू करने वाले ऐसे चेहरे भीड़ में कहीं खो जाते हैं, पर जब मिलते हैं, तो लंबे समय तक अपनी चमक छोड़ जाते हैं।


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