मौत के साये में ज़िंदगी का हौसला

 



ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, अगर यह देखना हो तो इसे मौत के साथ जोड़कर देखिए। यकीनन जिंदगी और मौत के बीच इतना कम फासला है कि इसे नापा भी नहीं जा सकता। हंसती-मुस्कुराती जिंदगी लम्हे भर में कब मौत की वादी में उतर जाती है, पता ही नहीं चलता। माना कि मौत का एक दिन तय है और हम यह भी जानते हैं कि वह किसी भी वक़्त आ सकती है, फिर भी ज़िंदगी जिये जाने का हौसला ज़िंदा दिली में छुपा है। 

हम मौत को बार-बार याद करके पल-पल इसलिए नहीं मरते, क्योंकि हमें उस दिन के बारे में पता नहीं होता, लेकिन अगर किसी को मालूम हो जाए कि वह पांच दिन, पांच महीने या पांच साल बाद मरने वाला है, तो सोचिए उसकी जिंदगी कैसी होगी? जिंदगी के प्रति उसका क्या रवैया होगा? दुनिया की चकाचौंध में व्यस्त हम उन लम्हों का अंदाजा भी नहीं लगा सकते, लेकिन ऐसे नाजुक हालात में अगर कोई हिम्मत नहीं हारता और हौसले के साथ जीता है, तो वह शख्स बेशक न केवल प्रेरक होता है, जब भी मौत और ज़िंदगी की बात छिड़ जाती है, वह याद आता है।

एक पत्रकार और लेखक के रूप में यूं तो जिंदगी में अनगिनत किरदारों का सामना हुआ। कुछ की कहानी कलम ने कागज़ के हवाले की और उनमें से कुछ कहानियां कागज़ से प्रिंट तक पहुंच सकीं और कुछ जेहन किसी कोने में यादों का हिस्सा बनकर सुरक्षित रह गईं। शायद नुसरत भी उन्हीं में से एक था, जो विभिन्न समय पर इसी तरह के हालात में याद आता रहा। पिछले दिनों पैलिएटिव केयर (Palliative care) की स्पेशलिस्ट डॉक्टर गायत्री से मिलने रेड हिल्स स्थित एम.एन.जे. कैंसर हॉस्पिटल जाना हुआ। उन्होंने बातचीत के दौरान बाहर बैठे मरीजों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इनमें से अकसर मरीज़ अपनी मौत के इंतजार में हैं। उन्हें यह भी पता है कि वे दुनिया में कुछ दिन या कुछ महीनों के मेहमान हैं। वे कैंसर के आखिरी स्टेज में हैं। पैलिएटिव केयर का विभाग उनकी मौत को तो नहीं रोक सकता, लेकिन आखिरी वक़्त में उनकी तकलीफ को कुछ कम करने की कोशिश कर रहा है। इन मरीज़ों का हाल सुनकर मैं तकरीबन चौबीस साल पहले, पुराने शहर हैदराबाद के मुगलपुरा में मुहम्मद नुसरत के साथ हुई मुलाकात को याद करने लगा। नुसरत से मेरी मुलाकात अगस्त 2002 के दूसरे हफ्ते में हुई थी।

आज भी सोचता हूं तो अपनी हैरानी को कम नहीं कर पाता। उस दिन, उस मुलाकात में नुसरत भी मुझे उस वक़्त से बीस साल पहले की दुनिया में ले गया था। डॉक्टरों ने उनसे बीस साल पहले कह दिया था कि वे ज्यादा से ज्यादा पांच साल तक जिंदा रह सकता है, लेकिन उन पांच सालों के इंतजार में उसने बीस साल काट दिए थे।

मुगलपुरा में पानी की टंकी के पास एम.आई.एम. के क्षेत्रीय दफ्तर में जितनी देर मैं नुसरत के सामने बैठा रहा, यह सोचता रहा कि वह शख्स मेरे सामने मौजूद था, जिसकी मौत की भविष्यवाणी डॉक्टरों ने बीस साल साल पहले ही कर दी थी, कि उसकी गिनती की सांसें रह गयी हैं। वह मौत के अकारण खौफ से दूर सुकून की जिंदगी गुजार रहा था। नुसरत सीधा-सादा मगर बड़ा दिलचस्प इंसान था। यूं तो वह मजलिस के इस क्षेत्रीय दफ्तर में एक कार्यकर्ता की हैसियत से काम करता था, लेकिन इस ऑफिस को कायम करने का श्रेय कुछ हद तक नुसरत और उसके साथियों के सिर ही जाता था। नुसरत की उम्र उस वक्त तकरीबन चालीस साल थी। लेकिन बचपन ही से ही पलते रहे दिल के मर्ज़ ने उसका दामन कुछ इस तरह पकड़ रखा था कि वह किसी को अपना शरीक-ए-हयात (जीवन साथी) नहीं बना सका (उसने शादी नहीं की)। तकरीबन बीस बरस पहले निम्स (NIMS) हॉस्पिटल में उसकी ओपन हार्ट सर्जरी हुई थी, जो आंध्र प्रदेश (उस समय का आंध्र प्रदेश राज्य, जिसमें तेलंगाना भी शामिल था) में पहली ओपन हार्ट सर्जरी थी।

इस मुलाकात के दौरान नुसरत ने अपनी जिंदगी का संक्षिप्त हाल कुछ यूं बयान किया था:

"मैं यहीं पैदा हुआ, ए.आर.बी. हाउस के पास, जहां आज पानी की टंकी है। उर्दू मीडियम से मैट्रिक तक पढ़ाई की। बचपन से ही मुझे सांस लेने में तकलीफ थी। ढाई साल तक बीमार रहा। आखिर में निम्स में मेरी ओपन हार्ट सर्जरी हुई। उस्मानिया हॉस्पिटल के डॉक्टर साहब थे पी.एस. राव साहब, उनके असिस्टेंट थे डॉक्टर डी. शांताराम, जो मेरे ऑपरेशन के लिए मद्रास (चेन्नई) से डॉक्टर के.वी. नायडू को बुलाए थे। ऑपरेशन के लिए हैदराबाद में सामान भी नहीं था, तो वह भी मद्रास (चेन्नई) से मंगाया गया था। 23 हजार रुपये लगे थे उस वक्त ऑपरेशन को। निम्स में हुआ मेरा ऑपरेशन आंध्र प्रदेश का पहला ओपन हार्ट सर्जरी ऑपरेशन था। 23 दिन तक दवाखाने में था मैं। 52 टांके लग गए थे मेरे जिस्म पर।"

जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना सुनाते हुए नुसरत के चेहरे पर कई भाव एक के बाद एक आए और चले गए। गुफ्तगू के दौरान वह अपनी शर्ट के बटन खोलकर ऑपरेशन के निशान बताने लगा... गर्दन से लेकर पेट के नीचे तक टांकों के निशान देखकर मैंने महसूस किया जैसे उसका ऑपरेशन हाल ही में हुआ हो, लेकिन बीस बरसों से ये टांके नुसरत को अपने जिस्म पर उस बड़े ऑपरेशन की याद हर लम्हा दिलाते रहे।

ओपन हार्ट सर्जरी तो कामयाब हुई और नुसरत अस्पताल से घर भी आ गया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि वह पांच साल तक ही जी सकेगा। डॉक्टरों का यह खुलासा नुसरत के जेहन पर मौत के दूसरे हमले की तैयारी थी, लेकिन डॉक्टरों की कही हुई बात पत्थर की लकीर भी बन जाए तो क़ुदरत के फैसले नहीं बदल सकती और खुदा के फजल से वह मेरे सामने अच्छा-भला बैठा था। लेकिन ज़िंदा रहने तक सेहत को बचाए रखने के लिए दवाएं और इंजेक्शन हर बीस दिन में एक बार लेना पड़ता था। नुसरत की ज़िंदगी का एक खास पहलू यह है कि वह हारा नहीं, बल्कि  लगातार हालात से लड़ता रहा। पांच साल बाद आने वाली मौत से घबराकर तिल-तिल मरने के बजाय बुलंद हौसले से उसने बाक़ी जिंदगी हंसी-खुशी तय करने का फैसला किया।

मौत चाहे आज हो, कल हो या परसों या किसी और दिन, ज़िंदगी रुकती नहीं है, लेकिन इसके चलने के साधनों का इंतजाम भी करना पड़ता है। नुसरत को भी तो कुछ करना था। चूंकि ज्यादा मेहनत-मशक्कत वाला काम नहीं कर सकता था, इसलिए नुसरत ने नामपल्ली में अजीजिया होटल के काउंटर पर बैठने की नौकरी स्वीकार कर ली। मासिक आय 400 रुपये से शुरू हुई और लगबघ छह साल के दौरान यह आय 600 रुपये मासिक तक पहुंची। बीमारी को देखते हुए नुसरत के भाई ने उसे आराम करने का मशविरा दिया। भाई के मशविरे पर कुछ दिनों की बेकारी रही, लेकिन फिर से काम करने का ख्याल आया। इसी दौरान कुछ दोस्तों के साथ नुसरत ने मजलिस पार्टी की गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया। मुगलपुरा में 1992 में जब मजलिस का दफ्तर शुरू हुआ, तो वह इसी दफ्तर का हिस्सा बन गया।

इस तरह शारीरिक रूप से बीमार, लेकिन मानसिक रूप से पर तंदुरुस्त नुसरत ने मजलिस के उक्त दफ्तर में अपने दस साल गुजार दिए। कुछ दिन बाद नुसरत की तनख्वाह भी तय कर दी गयी। नुसरत की खुशकिस्मती थी कि भाई, भाभियां और खानदान के दूसरे लोग उसका ख्याल रखते थे।

नुसरत ने पार्टी के दफ्तर में काम करते हुए एक खास काम शुरू किया। जो कोई अपनी शिकायत लेकर दफ्तर आता, वह उनकी शिकायत रजिस्टर में लिख लेता और उसे एम.एल.ए. तक पहुंचा देता। जब नुसरत से मेरी मुलाकात हुई थी, तो रजिस्टर में हजारों लोगों की शिकायतें दर्ज थीं और उनमें से ज्यादातर हल हो चुकी थीं।

नुसरत अपनी कुछ जी जाना चाहता था कि जिंदगी के बाद भी वह लोगों के दिलों में जिंदा रहे। कहता रहा— "जब तक जिंदा रखे, रहूंगा, बाकी उसकी मर्जी।"

नुसरत

उस मुलाकात के बाद नुसरत से एक-आध बार ही मिलना हुआ, लेकिन जब भी ऐसे किसी परिस्थिति का जिक्र होता है, नुसरत की शक्ल जेहन के किसी कोने से निकलकर आंखों के सामने तैरने लगती है। सोचता हूँ कि मौत के साये में ज़िंदगी का हौसला कठिन ज़रूर है, लेकिन उसको पा लेना ही जी लेना है।

 

 

 

Comments

Popular posts from this blog

माया मोहन

बर्फ़ वाले डॉक्टर साब

दिल हूम हूम करे.. आइसक्रीम का स्वाद और भूकंप के झटके