۔۔۔۔ जिंदगी का साथ निभाता चलाया गया
भीड़ में घूमते-फिरते भटकते चेहरों में उस दिन एक ऐसे चेहरे का सामना हुआ, जिसने कभी अपनी ज़िंदगी की कश्ती खुद चलाने की कोशिश नहीं की। अगर कभी की भी होगी तो वह उसके बस की बात नहीं रही। वह देखने में तो एक मामूली सा चेहरा लगता था, बिल्कुल एक आम ग़रीब आदमी की तरह, लेकिन जब कुछ देर के लिए ही सही मैंने उसकी ज़िंदगी में थोड़ा-सा झांकने की कोशिश की तो वह मेरी मंशा समझ गया और उसने अपनी मर्जी से अपनी ज़िंदगी के अंदरूनी हिस्से के कुछ खिड़कियाँ खोल दीं। फिर तो उसके अतीत में थोड़ा और आगे जाने का रास्ता निकल आया। वह मेरे लिए अब मामूली नहीं रहा था, बल्कि कई सारे अजूबों का एक संग्रह-सा लगने लगा।
उसकी ज़िंदगी अजीबोगरीब घटनाओं का एक लंबा सिलसिला थी। लगभग सत्तर से पचहत्तर साल का वह बुजुर्ग व्यक्ति शहर की सड़कों, फुटपाथों, चौराहों, बाज़ारों, गलियों में अक्षरमाला के पोस्टर लिए घूमता था। सुबह सुबह ही वह रूखी सूखी खाकर बाज़ार से खरीदे हुए पोस्टर लेकर लिए गली कूचों में निकल पड़ता। पोस्टर बेचने के लिए वह दूसरे हाकरों की तरह आवाज़ें नहीं लगाता और न ही किसी से खरीदने की ज़िद करता, बल्कि इच्छा और लालसा से मुक्त एक लकड़ी के बने ‘क्रॉस’ जैसे हुक पर पोस्टर टांगकर इधर-उधर घूमता रहता। कभी कहीं ठहर जाता, इंतज़ार करता कि कोई उससे पूछ ले, और कभी किसी चायखाने के पास आराम कर लेता। उसका कोई एक ठिकाना भी नहीं था। हैदराबाद का हर मोहल्ला उसके लिए मार्केट था, कभी मेहदीपट्टनम, कभी नामपल्ली, कभी फीलखाना, कभी बेगम बाज़ार, कभी लकड़ी का पुल, कभी जुमेरात बाज़ार, कभी अफज़लगंज, कभी चादरघाट, कभी गूलीगुड़ा बस स्टैंड, कभी आबिड्स…
उसे इस बात की ज्यादा चिंता नहीं होती थी कि आमदनी कितनी होगी, कितना कमाएगा, घर क्या ले जाएगा। शायद समय का गुजर जाना ही उसके लिए काफी था, बल्कि वह अपने इस काम में समय बिताकर यह जताना चाहता था कि वह बेकार नहीं है। आज की भाषा में इसे ‘क्वालिटी टाइम’ भी कहा जा सकता है।
उस किरदार से मेरी मुलाकात आज से लगभग पच्चीस साल पहले की बात है। उस दौर में अभी जब स्मार्टफोन आम लोगों की जेब में नहीं आए थे और न ही कोई सोशल मीडिया था। ज़्यादातर मजदूर, छोटे व्यापारी और मिडिल क्लास के लोगों के लिए नुक्कड़ की चाय की होटल ही सोशल हो जाने (मेल मिलाप) का जरिया हुआ करती थी। याद आता है कि इस ‘पोस्टर मैन’ से मेरी मुलाकात पुराने शहर (हैदराबाद) के एक चायखाने के बाहर ही हुई थी।
उन दिनों हर हफ्ता किसी न किसी सच्ची कहानी के असली किरदार से मिलने की दौड़ धूप चलती रहती थी। जब मैंने इस किरदार का सच जाना तो कुछ देर के लिए हैरत से उसकी सूरत को ताकता रहा, जब उसने बताया कि उसकी सात शादियां हो चुकी हैं।
यहां हमारे लिए तो एक के साथ ही जिंदगी मुश्किल से कटती है और इस ‘पोस्टर मैन’ की सात शादियां! और काम क्या है — घूम-फिर कर पोस्टर बेचना। यह काम भी वह इसलिए नहीं करता कि परिवार का पालन-पोषण करना है या बेटियों की शादी करनी है। उसे तो बस अपनी चाय का खर्च निकालना होता है।
अपने आप को अफगान पठानों की नसल से बताने वाला सलामत खान कद-काठी से भी पूरी तरह काबुली पठान जैसा ही था। चेहरे से साफ झलकता था कि उसने जिंदगी में बहुत मुश्किलें झेली हैं। बातों-बातों में जब थोड़ी झिझक कम हुई तो वो कहने लगा —
- इज़्ज़त की रोटी खुदा दे रहा है और इज़्ज़त की मौत मिले, यही दुआ करता हूं। पहले अपनी ज़िंदगी के हालात पर रोता था, अब आंसू भी सूख गए हैं।
सलामत खान की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन वह उनसे किसी न किसी तरह बाहर निकलता गया। उसने जो भी किया हालात के बहाव में किया। जिंदगी जहाँ ले गयी वो उसकी उंगली थामे चलता चला गया। उसका कोई भी फैसला अपना खुद का नहीं रहा और न उसने कभी अपने भविष्य के बारे में गंभरती से सोचा।
कोल्हापुर के पास एक छोटे से शहर बुराद में 1930 के आस पास पैदा हुए सलामत खान ने अपने अतीत से कुछ परतें हटाईं। कुछ चित्र प्रस्तुत किये-
- था तो मैं अंगूठा छाप, चुनांचे मैंने अपनी ज़िंदगी का आग़ाज़ टूरिस्ट बस के एक कंडक्टर के तौर पर किया और फिर ड्राइवर बन गया। अठारह उन्नीस साल की उम्र में ही एक ज़िंदगी का अहम वाक़िआ होकर गुज़र गया। पहली शादी हुई और तलाक भी। जब वहाँ दिल नहीं लगा तो हैदराबाद चला आया और यहाँ एक नवाब के पास कार ड्राइवर की नौकरी कर ली।
सलामत ख़ान जब हैदराबाद आया तो, उस वक़्त तक अभी हैदराबाद रियासत भारतीय संघ में शामिल नहीं हुई थी। यह नौजवान पठान एक नवाब के यहाँ नौकरी करते हुए फील खाना में रहने लगा। कुछ साल बाद उसने यहाँ एक लड़की से निकाह कर लिया। इस निकाह की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। उसने एक बेसहारा लड़की के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और फिर दो बेसहारा एक दूसरे का सहारा बन गए, लेकिन बदकिस्मती से सलामत ख़ान की दूसरी बीवी शादी के छः सात महीनों बाद ही बीमार होकर चल बसी। उसकी याद में सलामत के चेहरे का भाव से साफ था कि वह उस आत्मीय सहारे को कभी भुला नहीं सका।
पहली बीवी से तलाक के बाद गाँव से हैदराबाद आना और यहाँ पर दूसरी बीवी का इंतक़ाल! इन तमाम हालात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि एक तन्हा आदमी पर इन घटनाओं का क्या असर हुआ होगा। फिर नवाब की नौकरी भी छूट गयी, या कहिए कि सलामत ख़ान ने छोड़ दी। वह भी महज़ इस लिए कि उसको नवाब के घर सब्ज़ी लाना और बच्चों के काम करना पसंद नहीं था। इतना ही नहीं उसने कार चलाना छोड़कर साइकिल रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। कुछ दिन जमकर मेहनत की तो देखते ही देखते सलामत ख़ान ने तीन रिक्शे खरीदलिए। अब वह साइकिल रिक्शे किराए पर देने लगा। वह तीन रिक्शों का मालिक बन चुका था। हालाँकि शादी-ब्याह के बारे में उसके तजुर्बे अच्छे नहीं थे, फिर भी आस-पास के लोग उसे भला अकेला किस तरह देख सकते थे। सलामत ख़ान ने कहानी का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए बताया -
- लोगों ने देखा कि एक शरीफ़ और ईमानदार नौजवान अकेला है, उसकी शादी करा दी जाए। इस तरह मेरा तीसरा निकाह भी हो गया। इस तीसरी बीवी के साथ रहते हुए साल-डेढ़ साल हुआ होगा कि बीवी ने साइकिल रिक्शे अपने नाम कराने की ज़िद शुरू कर दी। ऐसा लगता था कि वह मुझे कंगाल करके छोड़ेगी, जिसके नतीजे में मैं उस बीवी से अलग हो गया।
तअज्जुब इस बात पर है कि सलामत ख़ान का चौथा और पाँचवाँ निकाह भी इन्हीं रिक्शों की वजह से टूट गया। चौथी बीवी से भी साइकिल रिक्शा को लेकर झगड़ा हुआ तो सलामत से उसका साथ छूट गया। जबकि पाँचवीं बीवी खुद उसको छोड़कर चली गई और फिर से शुरू हुई अकेलेपन की ज़िंदगी...!!
वह उन दिनों नामपल्ली में एक मकान में रहने लगा था। वहीं पर एक तलाकशुदा महिला से उसने निकाह कर लिया, जिसको पहले शौहर से एक बेटा और एक बेटी थी। सलामत ख़ान को अपनी इस छठी बीवी से कुछ बच्चे भी हुए। सब ठीक-ठाक चल रहा था कि बीवी ने अपनी बड़ी लड़की (पहले शौहर से हुई बेटी) को सऊदी में एक शेख से ब्याह दिया। उस बीवी और उसके बच्चों की कहानी सुनाते हुए सलामत के चेहरे पर कई भाव आते-जाते रहे-
- शेख से ब्याही गई बेटी से जब बाहर की दौलत मिलने लगी तो मेरी छठी बीवी ने मुझमें दिलचस्पी लेना छोड़ दिया। हालाँकि मुझे बाहर से आने वाली दौलत से कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस तरह यह बीवी भी मुझसे अलग हो गई। फिर मैंने बारकस के एक चाउस की लड़की से निकाह कर लिया। यह निकाह मेरे लिए अंतिम, लेकिन इत्मिनान से भरपूर साबित हुआ। सातवीं बीवी जी-जान से चाहती है, बहुत खयाल रखती है।
अच्छे लोग मुश्किल से मिलते हैं, और जीवनसाथी तो और मुश्किल से। अकसर लोग जो मिल जाते हैं उनसे निभा कर लेते हैं, कभी उनको अपनी तरह बनाकर या कभी खुद उनकी तरह बनकर। सलामत खान की ख़ुशनसीबी ही कही जा सकती है कि उसकी सातवीं बीवी घर पर बच्चों को क़ुरान पढ़ाकर सलामत का घर चलाने में मदद कर रही थी, बल्कि यूँ कहें तो ज़्यादा बेहतर होगा कि घर वही चला रही थी। बातों-बातों में सलामत ख़ान ने कहा—
- मैं अपने चार बेटों और छः बेटियों की शादी कर चुका हूँ और अब ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन गुज़ार रहा हूँ। इन कुछ दिनों में मैंने अपने किसी लड़के की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से कभी नहीं देखा। अब तो रिक्शा चलाने की मेरी उम्र भी नहीं रही। इसलिए पोस्टर बेचना शुरू कर दिया है।
हैदराबाद में सलामत ख़ान का सफ़र किराए के घर से शुरू हुआ और किराए के घर पर ही ख़त्म होता दिखाई देता था, जबकि उसके बच्चे अपने ज़ाती मकानों में रह रहे थे। सलामत ख़ान ने सर्द आह भरते हुए कहा था—
- बीती हुई ज़िंदगी के बारे में अब सोचता हूँ तो लगता है कि मेरी ज़िंदगी बेमक़सद ही गुज़र गई! हालात ने ज़िंदगी को जिस तरह भी मोड़ा, मैं मुड़ गया। यार-दोस्तों की करमफ़रमाई भी मेरे साथ रही। अब यह करमफ़रमाई अच्छी थी या बुरी, कुछ याद नहीं।
हो सकता है कि हमारे आस-पास के ऐसे बहुत सारे चेहरे मिल भी जाएँ, जिन्होंने अपने आपको हालात के बहाव पर छोड़ दिया हो। वे यह दावा भी नहीं करते कि वे दुनिया के लिए रोल मॉडल या किसी तरह का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनकी कहानी भी तो इसी धरती की कहानी है।
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