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शरीर और आत्मा के बीच के रिश्ते को समझने के लिए सीखा नृत्य

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निहारिका तुम्मला निहारिक युवा कत्थक कलाकार हैं। हालाँकि किसी भी शास्त्रीय कलाकार के बारे में यह सुना जाता है कि उन्होंने यह कला बचपन से सीखी है। प्रारंभिक जीवन में ही उन्हें यह शौक़ हो गया था। कई गुरुओं से उनकी तालीम जारी रही आदि आदि, लेकिन निहारिका के साथ मामला कुछ अलग है। उन्हेें यह शौक़ 19 वर्ष की उम्र में विदेश की भूमि पर इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान हुआ। उनकी बहुत छोटी-सी, लेकिन बहुत दिलचस्प कहानी है। उन्होंने कला को पेशे के तौर पर नहीं, बल्कि शौक़ के रूप मेें ही अपनाया और जीवन भर इसी भावना से कत्थक के साथ जुड़ी रहना चाहती हैं। वे बताती हैं- मैं एक विद्यार्थी ही हूँ। पाँच-छह वर्षों के अपने कलात्मक जीवन मेें जो कुछ सीखा है, उसको सुरक्षित करने और अधिक ज्ञान अर्जित करने, सीखने व रियाज़ करने और कला की बारीकियों को जानने का प्रयास कर रही हूँ। मेरा मानना है कि शास्त्रीय कला के क्षेत्र में कोई भी कलाकार जीवन भर विद्यार्थी ही रहता है। बल्कि मैं तो यह कहना चाहूँगी कि कला विशेष को सीखने के लिए, एक पूरा जीवन नाकाफी है।     यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटो में टे...

साँस से भी करीब है संगीत : रज़ा अली खान

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उस्ताद रज़ा अली खान ख़्याल गायकी के क्षेत्र में जाने-पहचाने कलाकार हैं। खास बात यह है कि वे उस्ताद बड़े गुलाम अली खान के पौत्र हैं। उन पर इस विरासत को संभालने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। उनका जन्म 8 अगस्त, 1962 में कराची में हुआ और बचपन दादा के साथ हैदराबाद में बीता। पहले दादा और बाद में पिता मुनव्वर अली खान से उन्होंने संगीत की शिक्षा ली। ख़्याल के साथ-साथ ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, गीत सोजख़्वानी, नोहाख्वानी और मनख़बत जैसी गायकी की विधाओं में उन्हें कमाल हासिल है। गायक होने के साथ-साथ उन्होंने संगीत संयोजन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी कंपोज़ की हुई ग़ज़लें गुलाम अली और पिनाज़ मसानी ने गायी हैं। उनके अलबम मूड्ल ऑफ इमोशन्स और धड़कन काफी लोकप्रिय हुए। वे काफी अरसे तक वीनस कंपनी में चीफ म्यूज़िक डॉयरेक्टर के पद पर काम कर चुके हैं। दूरदर्शन की कई टेलीफिल्मों के लिए उन्होंने संगीत निर्देशन किया है। वे बंगाल की संगीत अकादमी के सदस्य भी हैं। उनका घराना क़सूर पटियाला कहलाता है। इसके बारे में रज़ा अली खान बताते हैं कि इसमें दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर और डागर के घरानों का एक ...

तलाश छोटी छोटी खुशियों की...

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देखना   मेरी   ऐनक   से.... उस कैबिन से निकला तो ,  दो पॉयलट बाहर खड़े थे। उन्होंने पूछा ,  कहाँ की उडान थी। मैंने कहा हुसैन सागर... जवाब था ,  बस इतनी दूर... आप हमारे साथ होते तो स्वित्ज़रलैंड घूम आते और फिर सब खिलखिलाकर हँस पड़े। कुछ दिन पहले फिरोज़ीगुडा में एयरइंडिया के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट सेंट्रल ट्रेनिंग स्टैबलिशमेंट में जाने का मौका मिला। दर असल जब मैं अपने दो तीन साथियों के साथ सीटीई के सेम्युलेटर में दाखिल हुआ तो कैप्टन गुप्ता हमारे साथ थे। उन्होंने पॉयल्ट्स को दी जाने वाली ट्रेनिंग का नमूना बताते हुए हमें भी थ्री डी के साथ हुसैन सागर का दौरा कराया। हम उस सेम्युलेटर बिल्डिंग से बाहर भी नहीं निकले और एक तकनीक ने हमें एहसास दिलाया कि हम सचमुच में कुछ देर में हवाई सफर कर आये हैं। यह सब थ्री डी और हैड्रोलिक व्यवस्था का कमाल था। एयर इंडिया की अधिकारी पूजा कौशिक से बातों बातों में जानकारी मिली कि इस सेम्युलेटर में दुनिया के कई देशों की यात्रा पर आधारित थ्री डी प्रस्तुतियाँ मौजूद हैं। इस तरह लगभग सारी दुनिया एक छोटे से सेम्युलेटर कक्ष में सिमट ...

भाषाओं को बचा सकती है टेक्नोलॉजी : प्रो. हरजिंदर सिंह

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प्रो .  हरजिंदर सिंह लाल्टू आईआईआईटी -  हैदराबाद में कंप्यूटेशनल नैचरल साइंस के प्रोफेसर हैं और मानविकी में कमाल रखते हैं। उन्हें तीन दशक से अधिक अध्यापन का अनुभव है तथा विज्ञान और टेक्नोलॉजी से जुड़कर काम कर रहे हैं। उनका जन्म  10  दिसंबर , 1957  को कोलकाता में हुआ। आईआईटी कानपुर से एमएससी की शिक्षा पूरी होने के बाद वे अमेरिका चले गये और यहाँ से प्रिंस्टन विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। लगभग  20  वर्षों तक उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। इसके बाद आईआईआईटी ,  हैदराबाद ,  चले आये। शिक्षा के दौरान वे विभिन्न वैचारिक आंदोलनों का हिस्सा रहे। उन्होंने अमेरिका और पंजाब के अलावा मध्य - प्रदेश में कुछ संस्थाओं के साथ सामाजिक आंदोलनों तथा अभियानों में भाग लिया। खास बात यह है कि रसायन और प्रौद्योगिकी जैसे विषयों में दिन रात लगे रहने के बावजूद उन्होंने हिन्दी साहित्य को क़रीब से जिया है। उनके  7  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही बांग्ला और अंग्रेज़ी से अनुवाद की उनकी कृतियाँ भी प्रकाशित...

हैदराबाद का अपना ब्रांड बनाना था उद्देश्य : एम ए मजीद

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एम ए मजीद आज हैदराबादी हलीम और बेकरी उद्योग में हैदराबाद ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान रखते हैं। शहर के पारंपारिक कपड़ा व्यापारी घराने में उनका जन्म हुआ। अनवारुल उलूम से उन्होंने डिग्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। मिठाई, बेकरी, होटल और हलीम में वे अपने परिवार के पहले उद्यमी हैं। वे एक सफल उद्यमी के रूप में जाने-जाते हैं, लेकिन यह सफलता उनके लिए आसान नहीं रही। पररंभिक कुछ वर्षों में ही उन्हें मिठाई और बेकरी के कारोबार में लाखों रुपये लगाने के बाद अचानक आार्थिक संकट से गुज़रना पड़ा। अपने हिस्से की सारी जायदाद बेचनी पड़ी। आार्थिक स्थिति काफी विकट हो गयी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और पिस्ता हाउस को फिर से खड़ा किया। आज हैदराबाद के एक खास ब्रांड के रूप में पिस्ता हाउस का नाम है। उनके इस कारोबार पर एक विद्यार्थी ने पीएचडी की उपाधि परप्त की है। इंडियन बज़िनेस स्कूल और ऐस्की सहित कई बड़ी संस्थाओं ने इस व्यापार पर अध्ययन करवाया है। सप्ताह के साक्षात्कार में उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं :- आप होटल और बेकरी उद्योग में परिवार के पहले कारोबारी हैं। इस...

सफलताओं का सफर वहाँ से शुरू होता है, जहाँ खोने के लिए कुछ न हो - सुभाष गुप्ता

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सुभाष गुप्ता रंगमंच, टीवी तथा रेडियो के कलाकार रहे हैं। 2 नवंबर, 1947 को पुरानी दिल्ली में इनका जन्म हुआ। यहीं पर स्कूली शिक्षा परप्त की। लगभग 50 वर्षों तक एक कलाकार के रूप में उन्होंने अनगिनत किरदारों को जिया। दिल्ली का अभियान थिएटर उनका कर्मस्थल रहा। विख्यात नाटककार राजेंदरनाथ के निर्देशन में उन्होंने नाटक पोलमपुर का, अलीबाबा, महानिर्वाण हनूष, उद्धवस्त धर्मशाला, जात ही पूछो साधु की सहित कई नाटकों में काम किया। वे गत 12 वर्षों से हैदराबाद में रह रहे हैं। यहाँ पर भी उन्होंने कुछ नाटकों में काम किया। हाल ही में उन्होंने ला-मकान में मंचित विजय तेंदुलकर केे ख्याति परप्त नाटक कमला का निर्देशन किया। इससे पूर्व उन्होंने हैदराबाद में `जी हुजूर' का मंचन किया। सुभाष गुप्ता मूल रूप से बैंककर्मी रहे हैं। कला की प्यास बुझाने के लिए उन्होंने रंगमंच और टीवी को चुना। ब्लैक एण्ड व्हाइट के दौर से लेकर हाल तक उन्होंने कई टेलीधारावाहिकों और टेलीफिल्मों में महत्वपूर्ण किरदार निभाए। कुलुभूषण खरबंदा, ओमपुरी, एस.एम. ज़हीर, कीमती आनंद, एच.एस. कुलकर्णी, शैलेंद्र गोयल, एम.के. रैना जैसे कई कलाकारों के साथ ...

किताबों में नहीं है कबीर का असली रूप : विपुल रिखी

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`कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी माँगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर ...' कबीर वाणी गाते हुए विपुल रिखी सुनने वालों को एक अजब शहर की सैर कराते हैं। वे हाल ही में हैदराबाद आये थे। कुछ सार्वजनिक और कुछ निजी महफ़िलों में उन्होंने हिस्सा लिया। कबीर की लोकगायन परंपरा को विपुल ने पेश किया। विपुल 19 मई, 1977 में दिल्ली में जन्मे, यहीं पले-बढ़े और अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी की। यहाँ तक तो उनके पास कबीर उतने ही थे, जितना एक प्रथम भाषा या द्वितीय भाषा हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी के पास होते हैं। एक दिन लोकगायन परंपरा के गायक प्र¼ाद टिपाणिया को सुनकर विपुल काफी प्रभावित हुए और कबीर प्रॉजेक्ट का हिस्सा बन गये। लेखक के रूप में दिल्ली और पुडुचेरी में समय गुज़ारने के बाद वे 2012 से बेंगलुरू में रह रहे हैं। सप्ताह के साक्षात्कार में उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं...  कबीर प्रॉजेक्ट से कैसे जुड़ना हुआ? दरअसल अंग्रेज़ी साहित्य में एमए करने के बाद मैंने लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में काम करना शुरू किया। मैंने कुछ डाक्युमेंटरी भी बनाए। वर्ष 2008 की बात है, मैं ...