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सफलताओं का सफर वहाँ से शुरू होता है, जहाँ खोने के लिए कुछ न हो - सुभाष गुप्ता

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सुभाष गुप्ता रंगमंच, टीवी तथा रेडियो के कलाकार रहे हैं। 2 नवंबर, 1947 को पुरानी दिल्ली में इनका जन्म हुआ। यहीं पर स्कूली शिक्षा परप्त की। लगभग 50 वर्षों तक एक कलाकार के रूप में उन्होंने अनगिनत किरदारों को जिया। दिल्ली का अभियान थिएटर उनका कर्मस्थल रहा। विख्यात नाटककार राजेंदरनाथ के निर्देशन में उन्होंने नाटक पोलमपुर का, अलीबाबा, महानिर्वाण हनूष, उद्धवस्त धर्मशाला, जात ही पूछो साधु की सहित कई नाटकों में काम किया। वे गत 12 वर्षों से हैदराबाद में रह रहे हैं। यहाँ पर भी उन्होंने कुछ नाटकों में काम किया। हाल ही में उन्होंने ला-मकान में मंचित विजय तेंदुलकर केे ख्याति परप्त नाटक कमला का निर्देशन किया। इससे पूर्व उन्होंने हैदराबाद में `जी हुजूर' का मंचन किया। सुभाष गुप्ता मूल रूप से बैंककर्मी रहे हैं। कला की प्यास बुझाने के लिए उन्होंने रंगमंच और टीवी को चुना। ब्लैक एण्ड व्हाइट के दौर से लेकर हाल तक उन्होंने कई टेलीधारावाहिकों और टेलीफिल्मों में महत्वपूर्ण किरदार निभाए। कुलुभूषण खरबंदा, ओमपुरी, एस.एम. ज़हीर, कीमती आनंद, एच.एस. कुलकर्णी, शैलेंद्र गोयल, एम.के. रैना जैसे कई कलाकारों के साथ ...

किताबों में नहीं है कबीर का असली रूप : विपुल रिखी

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`कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी माँगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर ...' कबीर वाणी गाते हुए विपुल रिखी सुनने वालों को एक अजब शहर की सैर कराते हैं। वे हाल ही में हैदराबाद आये थे। कुछ सार्वजनिक और कुछ निजी महफ़िलों में उन्होंने हिस्सा लिया। कबीर की लोकगायन परंपरा को विपुल ने पेश किया। विपुल 19 मई, 1977 में दिल्ली में जन्मे, यहीं पले-बढ़े और अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी की। यहाँ तक तो उनके पास कबीर उतने ही थे, जितना एक प्रथम भाषा या द्वितीय भाषा हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी के पास होते हैं। एक दिन लोकगायन परंपरा के गायक प्र¼ाद टिपाणिया को सुनकर विपुल काफी प्रभावित हुए और कबीर प्रॉजेक्ट का हिस्सा बन गये। लेखक के रूप में दिल्ली और पुडुचेरी में समय गुज़ारने के बाद वे 2012 से बेंगलुरू में रह रहे हैं। सप्ताह के साक्षात्कार में उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं...  कबीर प्रॉजेक्ट से कैसे जुड़ना हुआ? दरअसल अंग्रेज़ी साहित्य में एमए करने के बाद मैंने लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में काम करना शुरू किया। मैंने कुछ डाक्युमेंटरी भी बनाए। वर्ष 2008 की बात है, मैं ...

भाषा और संस्कृति का दौर लौट आएगा : प्रो.बी.एस. सत्यनारायण

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प्रो.बी.एस. सत्यनारायण हीरो ग्रुप के बीएमएल मुंजाल विश्वविद्यालय, गुड़गाँव के कुलपति हैं। वे बहुत ही दिलचस्प इंसान हैं। उन्होंने बचपन के आठ-दस साल लगभग जंगलों में गुज़ारे हैं। कन्नड़ के साथ-साथ हिन्दी, अंग्रेज़ी, पंजाबी, मलयाली, तमिल, तेलुगु और बांगला भाषाओं का अच्छा ज्ञान रखते हैं। उनके पिता हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी में कर्मचारी थे। उन्हें पिता के साथ ही, जहाँ नयी परियोजना पर काम शुरू हो, जाना पड़ता था। उनका जन्म राजस्थान के कोटा जिले में हुआ, लेकिन बाद में केरल और अन्य राज्यों में उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। सत्यनारायण देश के प्रमुख भौतिक वैज्ञानिकों में स्थान रखते हैं। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय, यूके से वैक्यूम नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स में डॉक्टरेट की है। वे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं। एक दर्जन से अधिक बड़े पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। कोल्ड कैथोड लैम्प आधारित विश्व का पहला रूम टेंप्रेचर ग्रोन नैनोकार्बन बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। देश की पहली इंटीग्रेटेड अमोर्फस सिलिकन सोलार ...

खत्म नहीं हो सकती किताब पढ़ने की संस्कृति : असग़र वजाहत

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असग़र वजाहत हिन्दी के मशहूर लेखक हैं। उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी और आलोचना के अलावा फिल्में भी लिखी हैं। वे 20 से अधिक पुस्तकों के रचनाकार हैं। 5 जुलाई, 1946 को उत्तर-प्रदेश के फतेहपुर में जन्मे असगर वजाहत ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और जामिया मिल्लिया में हिन्दी के प्रोफेसर रहे। `जिन लाहौर नई वेख्या, ते जन्म्या नई' जैसे मशहूर ज़माना रचना के नाटककार असगर वजाहत ने डाक्युमेंट्री फिल्में भी बनायी हैं। उन्होंने धारावाहिक भी लिखे हैं और चित्रकार के रूप में रंगों के साथ खेला है।   उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं... बचपन से ही लिखने का शौक रहा या इत्तेफाकिया तौर पर आपने लेखन के क्षेत्र में कदम रखा? आप कह सकते हैं कि इत्तेफाक रहा। मुझे पढ़ने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि फूल-पत्तों, पेड़-पौधों और पक्षियों में अधिक दिलचस्पी हुआ करती थी। मैं सोचता था कि फलाँ रंग की चिड़िया को कैसे पकड़ा जाए। मैं गुलाब के फूल को कागज़ पर रगड़ता और उसका लाल रंग देखकर खुश होता था। कमल के फूल कहाँ खिलते हैं, ये ढूंढ़ने निकल जाता था। बचपन में गोंद खाने का बहुत शौक़ था, इसल...

क्या घर मुझसे प्रेम करता है...

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देखना मेरी ऐनक से.... मैं अकसर सोचता हूँ कि मैं घर क्यों जाता हूँ , मुझे घर क्यों जाना चाहिए ? घर में क्या है , जो मुझे बुलाता है , आकर्षित करता है ? ऑफिस का काम पूरा करने के बाद ऐसा क्या है जो मुझे सीधे घर की ओर खींचता है , बेचैन करता है कि मुझे कहीं और जाने के बारे में न सोचकर जल्द से जल्द घर की ओर जाना चाहिए। फिर मैं सोचता हूँ कि बहुत सारे लोग हैं , जो घर जाकर भी घर नहीं जाते , घर के पास की किसी पान की दुकान या चाय खाने पर बैठकर गप्पे मारते हैं , चबूतरे पर बैठकर रात का काफी सारा हिस्सा घर के बाहर ही बिताते हैं , तो फिर घर क्यों जाना चाहिए। जब शहर की पुलिस ने चबूतरा अभियान शुरू किया था , तब भी मैं सोचता रहा कि क्यों लोगों को घर अपने अंदर नहीं समाता , क्यों नहीं वह अपने भीतर रहने वालों को इतना प्यार करता कि एक बार जब थके हारे लौट आयें तो फिर से बाहर जाने के बारे में न सोचें।   उसमें रहने और उसका प्यार पाने के लिए बेचैनी बढ़ती रहे और अदमी दफ्तर से घर की दूरी के लंबे लंबे रास्ते तय करता, ट्राफिक के अंतहीन समंदरों में तैरता , मैदानों में दौड़ता और पहाड़ों और वादियों को ची...

हिन्दी को बनाना चाहता हूँ फैशन : मनीष गुप्ता

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इस संसार में हज़ारों लोगों ने लाखों करोड़ों लड़ाइयाँ लड़ी हैं। कहते हैं, ज्यादातर लड़ाइयाँ जर, जोरू और ज़मीन के लिए लड़ी गयीं। लगता है, यह बात कहने वालों ने एक और `ज़' छोड़ दिया था। यह है ज़बान का `ज'। पता नहीं इसके लिए कितने लोगों ने कितनी लड़ाइयाँ लड़ीं और क्या हासिल किया, लेकिन एक जंग मनीष गुप्ता भी लड़ रहे हैं। हालाँकि, उनकी यह जंग किसी भाषा के खिलाफ नहीं हैं और वो खुद भी इसे लड़ाई नहीं मानते, बल्कि उनका यह आंदोलन निज भाषा से अपनी ज़िंदगी खूबसूरत बनाने के लिए है। यह आंदोलन केवल दिमाग और जेब का नहीं, बल्कि दिल का भी है। मनीष गुप्ता दिल और दिमाग की संपत्ति अर्थात समझ को विकसित करने के लिए बोलने, सुनने और सुनाने की प्रवृत्ति को उत्साहित करने की ऐसी धाम यात्रा पर निकल पड़े हैं, जिसे निज भाषा के अलावा किसी और साधन या उपकरण से पूरा नहीं किया जा सकता है। फिल्मकार और चित्रकार मनीष गुप्ता कविता में डिजिटल क्रांति के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे हिन्दी कविता और उर्दू स्टूडियो यू-ट्यूब चैनल के संस्थापक हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में वे पर्यटन प्रबंधन के अतिथि प्रोफेसर भी हैं। दस-पंद्रह ...

रहस्यों से भरे कमरे का ताला खोलने वाली कलाकार सीमा कोहली

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सीमा कोहली एक चित्रकार हैं। समकालीन कलाकारों में उन्होंने अपनी खास जगह बनाई है। 1960 में न्यू राजेंद्र नगर ,   दिल्ली में एक सिख मगर आर्य समाज से प्रभावित परिवार में उनका जन्म हुआ। वे छोटी थीं , तो बुहत कम बोलती थीं। वे बचपन से ही अंतर्मुखी थीं। उनका यही अंतर्मुखी होना , उन्हें रंगों की दुनिया में ले गया। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से दर्शन शास्त्र और साउथ पॉलिटेक्निक से एप्लाइड आर्ट में क्रमशः डिग्री और डिप्लोमा किया। मूर्तिकला , वीडियो इंस्टेलेशन , मिक्स मीडिया , फोटोग्राफी सहित कई शैलियों को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का साधन बनाया। उन्हें 2008 में ललित कला नेशनल अवॉर्ड फॉर वुमेन और 2009 में वीडियो इंस्टेलेशन के लिए फ्लोरेंस बिनाल में गोल्ड अवॉर्ड प्रदान किया गया। एक रचनाकार के रूप में अपने और संसार के अस्तित्व के प्रश्नों की खोज के लिए उन्होंने मन में उठने वाले जिन प्रश्नों के उत्तर तलाशे , उन्हें चित्रात्मक भाषा में अभिव्यक्त किया। उनकी चित्र श्रृंखला ` हिरण्य गर्भ ' काफी लोकप्रिय हुई। देश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ विदेशों में उनके चित्रों को सराहा गया है। कलाकृत...