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क्या घर मुझसे प्रेम करता है...

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देखना मेरी ऐनक से.... मैं अकसर सोचता हूँ कि मैं घर क्यों जाता हूँ , मुझे घर क्यों जाना चाहिए ? घर में क्या है , जो मुझे बुलाता है , आकर्षित करता है ? ऑफिस का काम पूरा करने के बाद ऐसा क्या है जो मुझे सीधे घर की ओर खींचता है , बेचैन करता है कि मुझे कहीं और जाने के बारे में न सोचकर जल्द से जल्द घर की ओर जाना चाहिए। फिर मैं सोचता हूँ कि बहुत सारे लोग हैं , जो घर जाकर भी घर नहीं जाते , घर के पास की किसी पान की दुकान या चाय खाने पर बैठकर गप्पे मारते हैं , चबूतरे पर बैठकर रात का काफी सारा हिस्सा घर के बाहर ही बिताते हैं , तो फिर घर क्यों जाना चाहिए। जब शहर की पुलिस ने चबूतरा अभियान शुरू किया था , तब भी मैं सोचता रहा कि क्यों लोगों को घर अपने अंदर नहीं समाता , क्यों नहीं वह अपने भीतर रहने वालों को इतना प्यार करता कि एक बार जब थके हारे लौट आयें तो फिर से बाहर जाने के बारे में न सोचें।   उसमें रहने और उसका प्यार पाने के लिए बेचैनी बढ़ती रहे और अदमी दफ्तर से घर की दूरी के लंबे लंबे रास्ते तय करता, ट्राफिक के अंतहीन समंदरों में तैरता , मैदानों में दौड़ता और पहाड़ों और वादियों को ची...

हिन्दी को बनाना चाहता हूँ फैशन : मनीष गुप्ता

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इस संसार में हज़ारों लोगों ने लाखों करोड़ों लड़ाइयाँ लड़ी हैं। कहते हैं, ज्यादातर लड़ाइयाँ जर, जोरू और ज़मीन के लिए लड़ी गयीं। लगता है, यह बात कहने वालों ने एक और `ज़' छोड़ दिया था। यह है ज़बान का `ज'। पता नहीं इसके लिए कितने लोगों ने कितनी लड़ाइयाँ लड़ीं और क्या हासिल किया, लेकिन एक जंग मनीष गुप्ता भी लड़ रहे हैं। हालाँकि, उनकी यह जंग किसी भाषा के खिलाफ नहीं हैं और वो खुद भी इसे लड़ाई नहीं मानते, बल्कि उनका यह आंदोलन निज भाषा से अपनी ज़िंदगी खूबसूरत बनाने के लिए है। यह आंदोलन केवल दिमाग और जेब का नहीं, बल्कि दिल का भी है। मनीष गुप्ता दिल और दिमाग की संपत्ति अर्थात समझ को विकसित करने के लिए बोलने, सुनने और सुनाने की प्रवृत्ति को उत्साहित करने की ऐसी धाम यात्रा पर निकल पड़े हैं, जिसे निज भाषा के अलावा किसी और साधन या उपकरण से पूरा नहीं किया जा सकता है। फिल्मकार और चित्रकार मनीष गुप्ता कविता में डिजिटल क्रांति के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे हिन्दी कविता और उर्दू स्टूडियो यू-ट्यूब चैनल के संस्थापक हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में वे पर्यटन प्रबंधन के अतिथि प्रोफेसर भी हैं। दस-पंद्रह ...

रहस्यों से भरे कमरे का ताला खोलने वाली कलाकार सीमा कोहली

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सीमा कोहली एक चित्रकार हैं। समकालीन कलाकारों में उन्होंने अपनी खास जगह बनाई है। 1960 में न्यू राजेंद्र नगर ,   दिल्ली में एक सिख मगर आर्य समाज से प्रभावित परिवार में उनका जन्म हुआ। वे छोटी थीं , तो बुहत कम बोलती थीं। वे बचपन से ही अंतर्मुखी थीं। उनका यही अंतर्मुखी होना , उन्हें रंगों की दुनिया में ले गया। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से दर्शन शास्त्र और साउथ पॉलिटेक्निक से एप्लाइड आर्ट में क्रमशः डिग्री और डिप्लोमा किया। मूर्तिकला , वीडियो इंस्टेलेशन , मिक्स मीडिया , फोटोग्राफी सहित कई शैलियों को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का साधन बनाया। उन्हें 2008 में ललित कला नेशनल अवॉर्ड फॉर वुमेन और 2009 में वीडियो इंस्टेलेशन के लिए फ्लोरेंस बिनाल में गोल्ड अवॉर्ड प्रदान किया गया। एक रचनाकार के रूप में अपने और संसार के अस्तित्व के प्रश्नों की खोज के लिए उन्होंने मन में उठने वाले जिन प्रश्नों के उत्तर तलाशे , उन्हें चित्रात्मक भाषा में अभिव्यक्त किया। उनकी चित्र श्रृंखला ` हिरण्य गर्भ ' काफी लोकप्रिय हुई। देश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ विदेशों में उनके चित्रों को सराहा गया है। कलाकृत...

भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी अवसाफ सईद से एक मुलाक़ात

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अवसाफ सईद भारतीय विदेश सेवा के 1989 बैच के अधिकारी हैं। वे इन दिनों सैशल्स में भारतीय उच्चायुक्त पद पर नियुक्त हैं। इससे पूर्व हैदराबाद में प्रांतीय पारपत्र अधिकारी के रूप व्यवस्था में कई प्रकार के सुधारात्मक कदम उठाने के लिए उन्हें याद किया जाता है। सऊदी अरब, अमेरिका सहित कई देशों में भारत सरकार के काउंसलेट जनरल के रूप में उन्होंने काम किया है। उनका जन्म 18 सितंबर, 1963 को हैदराबाद के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। पिता एवज़ सईद शहर के जाने-माने साहित्यकार थे। अवसाफ सईद ने अनवारुल उलूम से इंटर की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से भू-गर्भ शास्त्र में स्नातकोत्तर और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। सेवा के दौरान कैरो स्थित अमेरिकन विश्वविद्यालय से अरबी भाषा में उन्होंने डिप्लोमा किया। लीबिया, सऊदी अरेबिया, डेनमार्क, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका, यमन सहित कई देशों में भारतीय विदेश मंत्रालय के महत्वपूर्ण पदों पर उन्होंने सेवाएँ प्रदान कीं। सऊदी अरेबिया में पहला एशियाई फिल्मोत्सव मनाने और इसकी परंपरा शुरू करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। सप्ताह के साक्षात्कार में उनसे हुई बातची...

किसी भी समस्या से अधिक महत्वपूर्ण है ज़िंदगी - मनीषा साबू

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जीवन में सब कुछ समय पर न हो, तो लोग कहते हैं कि ट्रेन छूट गयी। कुछ लोग हैं कि इसकी परवाह किए बिना अपना सफर खुद तय करते हैं और लक्ष्य की ओर निकल पड़ते हैं। वे बीते समय की परवाह नहीं करते और यात्रा शुरू कर देते हैं, इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखते। ऐसे ही लोगों में मनीषा साबू का नाम आता है। उन्होंने विवाह के बाद लगभग 8 वर्ष तक अपना बज़िनेस किया। जब मन किसी और दिशा में जाने को प्रेरित किया, तो कॉर्पोरेट दुनिया की ओर निकल पड़ीं और कुछ ही वर्षों में अपनी पहचान बनायी। मनीषा साबू हैदराबाद-वरंगल मार्ग पर घटकेसर पर लगभग 450 एकड़ में स्थापित इंफोसेस कैंपस की सेंटर हेड और असोसिएट वाइस प्रेसिंडेंट हैं। इस सेंटर में 17,000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। इससे पूर्व उन्होंने कॉग्निजियंट टेक्नोलॉजी सोल्युशन्स तथा कुछ और कंपनियों में भी काम किया। उनकी यह उपलब्धि उनके अपने व्यक्तित्व और लक्ष्य के प्रति डटे रहकर काम करने के कारण है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रपत्रों एवं प्रस्तुतियों के कारण भी ये जानी जाती हैं। मनीषा साबू का जन्म महाराष्ट्र में हुआ। उनके पिता इंजीनियर हैं, जो वरिष्...