कभी तो ऐसा लगता है कि जिन्दगी अपना पूरा हक मांगती है, लेकिन टुकड़ों में जीता आदमी उसका यह हक कैसे अदा करे। जिनको एक पल जीने के लिए कई बार मरना पड़ता है और जिन्दगी एक बोझ सी लगने लगती है, उनके बीच रह कर उन का उत्साह बढाने के बारे में सोच रहा हूँ। सोच रहा हूँ के उन के बोझ को हल्का करने कि क्या तदबीर हो सकती है? यही हो सकता है के उनमे जिंदगी से मोहब्बत पैदा कि जाए, ताकि जो भी पल जीयें मस्त और मज़े से जियें।
बर्फ़ वाले डॉक्टर साब
यह उन दिनों की बात है जब मैं उर्दू दैनिक मुन्सिफ़ के लिए ' हुजूम में चेहरा ' कॉलम लिख रहा था। इस कॉलम के बहाने हर हफ़्ते किसी न किसी से मिलना और उनसे उनकी कहानियाँ सुनना एक दिलचस्प सिलसिला चल निकला था। इस कॉलम के लिए लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखी। 1999 से 2005 के बीच लिखी गई इन कहानियों के कुछ हिस्से मैं इस डिजिटल दुनिया को सौंप रहा हूँ। पहली कहानी है.. बर्फ़ वाले डॉक्टर साब सफलता और असफलता दो ज़रूरी चीज़ें हैं , जो इंसान की ज़िंदगी में काफ़ी महत्व रखती हैं, क्योंकि ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव इन्हीं पर निर्भर करते हैं। कुछ लोग ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर तराज़ू के एक पलड़े में अपनी और दूसरे में अपने दोस्तों , पड़ोसियों और जान-पहचान वालों की ज़िंदगी को तौलने के आदी हो जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी हैं , जो सफलता और असफलता के इन दो पलड़ों से अलग-थलग , अपने तरीके से अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं , जैसे अपने दिन गिन रहे हों या बस ऐसे ही गुज़ार रहे हों, लेकिन उसमें भी उनका अपना रस है, अनुभव है, आनंद है। सोचता हूँ वो लोग किस हालत में जी रहे होंगे जो न तो निर...
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